महुली-पोलवा में धूमधाम से मनाया गया कर्मा पर्व मांदर की थाप और कर्मा गीतों पर थिरके ग्रामीण,

महुली-पोलवा में धूमधाम से मनाया गया करमा पर्व
मांदर की थाप और करम गीतों पर थिरके ग्रामीण, करम देव की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना; जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण का दिया संदेश
महुली (सोनभद्र)। दुद्धी ब्लॉक क्षेत्र के महुली-पोलवा में मंगलवार की रात गोंडराजे बरियार शाह युवा शक्ति संगठन के तत्वावधान में करमा पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और उल्लास के साथ मनाया गया। अखड़ा में करम डाली की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद मांदर की थाप और पारंपरिक करम गीतों ने माहौल को जीवंत कर दिया। ग्रामीणों ने देर रात तक सामूहिक नृत्य कर अपनी लोकसंस्कृति और परंपरा का उत्सव मनाया।
आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण लोकपर्व है करमा
करमा पर्व मुख्य रूप से आदिवासी एवं जनजातीय समुदायों का प्रमुख लोकपर्व है। सोनभद्र सहित झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में गोंड, उरांव, बैगा, कोरवा सहित विभिन्न जनजातीय समुदाय इसे अपनी-अपनी लोकपरंपराओं के अनुसार मनाते हैं। पर्व में करम वृक्ष की डाल को अखड़ा में स्थापित कर करम देवता की पूजा की जाती है। लोकमान्यता के अनुसार करम देवता को सुख-समृद्धि, उन्नति, अच्छी फसल और परिवार की खुशहाली से जोड़ा जाता है।
करम देवता की लोककथा से जुड़ा है पर्व
लोकपरंपरा में करमा पर्व से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें एक प्रमुख मान्यता के अनुसार सात भाइयों और उनकी बहन की कथा करमा पर्व से जुड़ी है। कथा में करम देवता की पूजा और उनके प्रति सम्मान को परिवार तथा समाज की खुशहाली का आधार माना गया है। मान्यता है कि करम वृक्ष प्रकृति, जीवन और समृद्धि का प्रतीक है। इसी कारण पर्व के दौरान करम डाली की पूजा कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि, अच्छी फसल और सामाजिक मंगल की कामना की जाती है।
करमा पर्व की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को भी दर्शाती है। करम वृक्ष की पूजा के माध्यम से पेड़-पौधों, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान की भावना व्यक्त की जाती है।
भाई-बहन के स्नेह और सामाजिक एकता का भी संदेश
कार्यक्रम के संयोजक पवन सिंह पोया एवं सचिव जितेंद्र सिंह ने कहा कि करमा पर्व हमारी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते का प्रतीक है। यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, परिवार की खुशहाली तथा समाज में आपसी भाईचारे, एकता और सद्भाव का संदेश देता है। मांदर, करम गीत और सामूहिक नृत्य के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पुरखों की परंपराओं से जुड़ती है।
उन्होंने कहा कि अखड़ा में करम डाली की पूजा और सामूहिक आयोजन पुरखों से मिली अनमोल सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं। करमा पर्व जल, जंगल और जमीन के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करता है तथा आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोकसंस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर करम देव से सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, शांति एवं खुशहाली की कामना की गई। साथ ही गांव की प्रकृति, संस्कृति और परंपराओं के सदैव सुरक्षित एवं समृद्ध रहने की प्रार्थना की गई।
कार्यक्रम में घनश्याम सिंह, त्रिपुरारी सिंह (युवा नेता), दिनेश सिंह (बीडीसी), अरविंद रावेन गोंड, सतेंद्र सिंह, विनोद सिंह, रायसिंह, राजवीर सिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं युवा उपस्थित रहे।
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