भूले बिसरे पितरों के श्राद्ध का दिन कल सर्व पितृ अमावस्या पर तर्पण के साथ शनि देव की आराधना का विशेष सहयोग

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पितरों का स्मरण कर तर्पण श्राद्ध और पिंडदान होगा इसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहते हैं
सवाई माधोपुर जाने-माने ज्योतिष आचार्य पंडित ताराचंद शास्त्री के अनुसार पितृपक्ष का समापन इस बार विशेष सहयोग के साथ होगा 10 अक्टूबर को सर्वप्रथम अमावस्या मनाई जाएगी खास बात यह है की अमावस्या शनिवार को होने के कारण इसे शनिचरी अमावस्या भी कहा जा रहा है इस तरह एक ही दिन पितरों के तर्पण श्रद्धा और दान पुण्य के साथ शनि देव की आराधना का भी सहयोग बनेगा धार्मिक मान्यताओं में इस दिन पितरों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्यता व्यक्त करने के लिए विशेष माना गया है
सर्वप्रथम अमावस्या पितृपक्ष का अंतिम दिन होती है यह दिन खास तौर पर उन पितरों के लिए माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि परिजनों को ज्ञात नहीं है अथवा किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्रद्धा नहीं किया जा सका धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सभी जाने अनजाने पितरों का स्मरण कर तर्पण श्राद्ध और पिंडदान किया जा सकता है इसी वजह से इसे सर्व पितृ अमावस्या कहा जाता है
तर्पण में काले तिल और जल का महत्व सर्वप्रथम अमावस्या पर श्रद्धालु प्राप्त है स्नान के बाद पितरों का स्नान करते हुए तर्पण करते हैं परंपरा के अनुसार कुछ काले तिल और जल से पितरों का तर्पण किया जाता है इसके बाद परिवार की परंपरा और समर्थ के अनुसार श्राद्ध भोज ब्राह्मण भोजन तथा जरूरतमंदों को भोजन करने की परंपरा भी है धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की तृप्ति और परिवार की सुख शांति की कामना की जाती है
कोआ और कुत्ते को भोजन करने की परंपरा भी है पितृ कर्म से जुड़ी लोक एवं धार्मिक परंपराओं में इस दिन कोआ और कुत्ते गाय को भोजन कराने का भी उल्लेख मिलता है परिवारों में पितरों के निमित्त तैयार भोजन का एक अंश इन जीवों को अर्पित किया जाता है इसके अलावा अपने समर्थ के अनुसार अन्य वस्त्र काले तिल जल पात्र की आदि का दान करने की भी परंपरा बताई गई है
धूप और पितरों का स्मरण की परंपरा कई परिवारों में सर्वप्रथम अमावस्या पर पितरों के निमित्त रूप देने की परंपरा भी है गाय के गोबर के उपले पर काला तिल जो चावल चंदन की कपूर गूगल और गुड़ आदि सामग्री से धूप देने की मान्यता है इस दौरान कुल देवता ग्राम देवता और पितरों का स्थान किया जाता है धार्मिक विधि परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है
तुलसी और फूल तोड़ने से बचने की मान्यता इस दिन धार्मिक कार्यों में कुछ सावधानियां रखने की भी परंपरा है कई परिवार सर्वप्रथम अमावस्या के दिन तुलसी और फूल तोड़ने से बचते हैं पूजा या धार्मिक कार्यों के लिए तुलसी की आवश्यकता हो तो एक दिन पहले तोड़ कर रखने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर प्रचलित है मुकेश कुमार जैन की खास रिपोर्ट
लोकेशन सवाई माधोपुर
न्यूज रिपोर्टर मुकेश कुमार जैन
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