खाकी को चुनौती या राजनीतिक रंजिश? कप्तानगंज में गोलियों की तड़तड़ाहट से मची सनसनी

अजीत मिश्रा (खोजी)
लोकतंत्र पर हमला या आपराधिक दुस्साहस? कप्तानगंज में प्रमुख प्रतिनिधि पर फायरिंग सुलगते सवाल छोड़ गई
- बस्ती में पुलिसिया इकबाल तार-तार: कप्तानगंज में प्रमुख प्रतिनिधि भोला निषाद की गाड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग, दहशत
- सुलगता बस्ती, बेखौफ अपराधी: जनप्रतिनिधि पर जानलेवा हमला, क्या कानून-व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित?
- कप्तानगंज में खूनी साजिश! भोला निषाद की स्कॉर्पियो पर कई राउंड गोलियां, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
- गोलीबारी से थराया कप्तानगंज: पुराने ईंट-भट्ठे के पास खौफनाक वारदात, बाल-बाल बचे प्रमुख प्रतिनिधि
- कप्तानगंज में प्रमुख प्रतिनिधि भोला निषाद पर जानलेवा हमला, गाड़ी के शीशे चकनाचूर; हमलावर फरार
- बस्ती: कार्यक्रम से लौट रहे प्रमुख प्रतिनिधि पर ताबड़तोड़ फायरिंग, इलाके में अफरा-तफरी, जांच में जुटी पुलिस
- कप्तानगंज गोलीकांड: भोला निषाद की गाड़ी को बनाया निशाना, एएसपी बोले– जल्द होगा वारदात का खुलासा
बस्ती जिले के कप्तानगंज थाना क्षेत्र से आई एक दहला देने वाली खबर ने प्रशासनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधि भोला निषाद की स्कॉर्पियो गाड़ी को निशाना बनाकर ताबड़तोड़ कई राउंड गोलियां चलाया जाना सिर्फ एक व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं है, बल्कि यह खुली चुनौती है उस तंत्र को जो आम से लेकर खास तक की सुरक्षा का दम भरता है। गनीमत रही कि इस जानलेवा हमले में भोला निषाद और उनके चालक बाल-बाल बच गए, वरना आज बस्ती का राजनीतिक और सामाजिक गलियारा एक और खूनी वारदात के मातम में डूबा होता।
सवाल यह उठता है कि आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हो चुके हैं? पुराने ईंट-भट्ठे के पास जिस दुस्साहस के साथ इस वारदात को अंजाम दिया गया, वह इस बात का साफ संकेत है कि बदमाशों में खाकी का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। किसी कार्यक्रम से लौट रहे जनप्रतिनिधि के करीबियों को निशाना बनाना यह बताता है कि हमलावरों को न तो कानून का डर है और न ही इस बात की परवाह कि राज्य में पुलिसिया इकबाल का क्या दावा किया जाता है। वाहन के पीछे के शीशे पर पड़े गोलियों के निशान इस बात गवाही दे रहे हैं कि हमला डराने के लिए नहीं, बल्कि सीधा जान से मारने की नीयत से किया गया था।
घटना के बाद इलाके में फैला आतंक और सनसनी स्वाभाविक है। जब एक रसूखदार और जनप्रतिनिधि प्रतिनिधि ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा का क्या आलम होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। पुलिस प्रशासन की ओर से अपर पुलिस अधीक्षक श्याम कांत का यह बयान सामने आया है कि खुलासे के लिए टीमें गठित कर दी गई हैं और सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। लेकिन क्या महज टीमें गठित कर देने भर से अपराधियों के मन से कानून का डर वापस आ जाएगा?
बस्ती की जनता अब कोरे आश्वासनों और कागजी मुकदमों से ऊब चुकी है। पुलिस के लिए यह मामला केवल एक और ‘एफआईआर’ दर्ज कर फाइलों में बंद करने का नहीं होना चाहिए, बल्कि यह साख की लड़ाई है। यदि जल्द ही उन चेहरों से नकाब नहीं उठाया गया जिन्होंने इस खौफनाक साजिश को रचा है, तो यह माना जाएगा कि अपराधियों के आगे महकमा पूरी तरह लाचार हो चुका है।
जनता को झुनझुने नहीं, ठोस नतीजे चाहिए। हमलावर चाहे जितने भी ताकतवर क्यों न हों, उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाना ही पुलिस प्रशासन की पहली और आखिरी प्राथमिकता होनी चाहिए, वरना यह खुली गुंडागर्दी बस्ती में एक नए और खतरनाक दौर की शुरुआत साबित होगी।
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