बड़ी कानूनी खबर | IPC 406 और 420 के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम आदेश, समन आदेश निरस्त**

🚨🔥 **बड़ी कानूनी खबर | IPC 406 और 420 के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम आदेश, समन आदेश निरस्त**
**प्रीति उर्फ प्रीति पांडेय और एक अन्य की याचिका पर लखनऊ पीठ की कार्रवाई | सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में मजिस्ट्रेट को नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश**
**लखनऊ।** भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 यानी आपराधिक न्यासभंग और धारा 420 यानी धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में आरोपों की कानूनी प्रकृति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का एक महत्वपूर्ण आदेश सामने आया है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की पीठ ने 6 अक्टूबर 2026 को प्रीति उर्फ प्रीति पांडेय एवं एक अन्य की याचिका पर आंशिक राहत देते हुए निचली अदालत द्वारा 14 जनवरी 2026 को पारित समन आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेट को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विचार करते हुए नए सिरे से आदेश पारित करने के लिए मामला वापस भेजा गया।
**क्या था याचिकाकर्ताओं का तर्क?**
बताया गया है कि मामला जनपद लखीमपुर खीरी की अदालत से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के फैसले *Delhi Race Club (1940) Ltd. बनाम State of Uttar Pradesh* का हवाला देते हुए दलील दी गई कि धारा 406 और 420 के आरोपों को एक ही घटनाक्रम में बिना दोनों अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्वों की अलग-अलग जांच किए यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
**सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्पष्ट किया था?**
सुप्रीम कोर्ट ने 23 अगस्त 2024 को दिए गए अपने फैसले, *Delhi Race Club (1940) Ltd. बनाम State of Uttar Pradesh*, 2024 INSC 626 में धारा 406 और 420 के बीच अंतर समझाया था। न्यायालय के अनुसार, आपराधिक न्यासभंग के लिए संपत्ति सौंपे जाने और उसके बेईमानी से दुरुपयोग या गबन जैसे तत्व महत्वपूर्ण हैं। वहीं, धोखाधड़ी के लिए छल तथा लेन-देन की शुरुआत से ही बेईमान मंशा जैसे तत्वों की जांच जरूरी है। फैसले में कहा गया कि समान तथ्यों के आधार पर दोनों अपराधों को एक साथ बनाए रखना संभव नहीं है, जब उनके आवश्यक तत्व आपस में मेल नहीं खाते। ।
**क्या समन आदेश निरस्त होने से पूरा मामला खत्म हो गया?**
नहीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट ने समन आदेश निरस्त कर मामले को नए आदेश के लिए मजिस्ट्रेट के पास वापस भेजा है। इसलिए इसे आरोपों से पूर्ण मुक्ति या पूरे मामले का अंतिम निपटारा मानना सही नहीं होगा। अब संबंधित मजिस्ट्रेट को शिकायत, उपलब्ध सामग्री और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कानूनी सिद्धांतों पर विचार करके आगे का आदेश पारित करना होगा।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि धारा 406 और 420 के बीच अंतर का निर्धारण केवल धाराओं के नाम देखकर नहीं, बल्कि शिकायत में वर्णित तथ्यों और संबंधित अपराधों के आवश्यक तत्वों के आधार पर किया जाता है। किसी विशेष मामले में दोनों धाराओं का प्रयोग उचित है या नहीं, यह उसके तथ्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों पर निर्भर करेगा।
**HULCHUL INDIA 24×7 की कानूनी रिपोर्ट:** इस आदेश का प्रमुख संदेश यह है कि आपराधिक मामलों में धाराएं लगाते समय कानून के आवश्यक तत्वों और न्यायिक फैसलों पर ध्यान देना जरूरी है। समन आदेश का निरस्त होना अपने आप में आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं है; आगे की स्थिति मजिस्ट्रेट के नए आदेश और मामले की कानूनी प्रक्रिया से तय होगी।
🚨 **HULCHUL INDIA 24×7 — बेबाक खबर • तेज असर**
📰 HULCHUL INDIA NEWS CHANNEL | VANDE BHARAT LIVE TV NEWS
✍️ विशेष रिपोर्ट: एलिक सिंह
📍 ब्यूरो प्रमुख: हलचल इंडिया न्यूज़ / वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़, सहारनपुर
📞 खबर, विज्ञापन, विज्ञप्ति एवं सूचना के लिए संपर्क: 8217554083
📲 Facebook पर Follow करें और खबर को Share करें।
**खबर वही, जो असर करे।**
🔔 Vande Bharat News Alerts
नई प्रमुख खबरों की browser notification पाने के लिए Subscribe करें।






