डेढ़ महीने से गायब पत्रावली की गुत्थी पुलिस भी नहीं सुलझा पा रही

अजीत मिश्रा (खोजी)
फाइलों की ‘गुमशुदगी’ या सिस्टम की कारगुजारी? ५७९ अनुदेशकों के भविष्य पर फिरता ‘लापरवाही’ का झाड़ू
- 2013 से 2016 के बीच नियुक्त अनुदेशकों की फाइलें गायब होने का मामला
बस्ती। बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालय बस्ती से गायब हुईं 579 अंशकालिक अनुदेशकों की नियुक्ति से जुड़ी फाइलें सिर्फ कागज का पन्ना नहीं हैं, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निकम्मेपन और जांच एजेंसियों की सुस्ती की जीती-जागती मिसाल हैं। डेढ़ महीने का वक्त बीत चुका है, लेकिन हमारी ‘हाईटेक’ पुलिस के हाथ खाली हैं।
वर्ष 2013 से 2016 के बीच हुए अनुदेशकों के चयन की मूल पत्रावलियों का अचानक दफ्तर से गायब हो जाना कोई सामान्य चोरी नहीं लगती। यह सवाल सीधे-सीधे प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है कि जिस दफ्तर में भारी भरकम अमला और सुरक्षा का दावा किया जाता है, वहां से इतनी बड़ी संख्या में सरकारी दस्तावेज हवा में कैसे विलीन हो गए?
पूछताछ का नाटक और ठप पड़ी जांच
पुलिस की कार्रवाई अब तक महज बीएसए कार्यालय के चक्कर काटने, बयानों की औपचारिकता पूरी करने और कागजी लफ्फाजी तक सीमित होकर रह गई है। गांधीनगर चौकी प्रभारी ने बीएसए, पांच जिला समन्वयकों (DC) और बाबुओं के बयान तो दर्ज कर लिए, लेकिन हासिल क्या हुआ? ‘शून्य’। जब जांच केवल बयानों तक सीमित रहेगी और कड़े कदम उठाने में खाकी के पसीने छूटेंगे, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।
फर्जीवाड़े पर पर्दा डालने का खेल?
सवाल उठना लाजमी है—क्या यह फाइलें गायब हुई हैं या सोची-समझी साजिश के तहत गायब कराई गई हैं?
नियुक्ति के समय के तत्कालीन बाबुओं पर शक की सुई घूम रही है। यह अंदेशा गहराता जा रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया में हुए संभावित फर्जीवाड़े और अपात्रों के चयन को छिपाने के लिए ही इन अहम दस्तावेजों को ‘ठिकाने’ लगा दिया गया है, ताकि सबूत ही न रहें और कोई जांच अंजाम तक न पहुंच सके।
अधिकारियों का वही रटा-रटाया जवाब
हर बार की तरह पुलिस और प्रशासन का एक ही रटा-रटाया बयान सामने आता है— “जांच जारी है, जल्द सफलता मिलेगी।”
सवाल यह है कि इस ‘जल्द’ की सीमा क्या है? क्या डेढ़ महीने का समय किसी फाइल का सुराग लगाने के लिए कम होता है? यदि पुलिस विभाग इतने गंभीर मामले में इतनी लाचारी दिखाएगा, तो आम जनता का न्याय और कानून व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।
अंतिम सवाल:
क्या उच्च अधिकारी इस मामले पर केवल मूकदर्शक बने रहेंगे या फिर लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों और सुस्त जांच अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई का चाबुक चलाएंगे? यदि 579 अनुदेशकों के भविष्य से जुड़े इस मामले की पहेली जल्द नहीं सुलझी, तो यह साफ हो जाएगा कि तंत्र खुद अपने ही भ्रष्टाचार को बचाने में जुटा है।
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