वन विभाग का ‘अजीब फरमान’: पेड़ कटते समय बताते तो पकड़ते, अब कैसे ढूँढें किसने काटा?

अजीत मिश्रा (खोजी)
वन विभाग का गजब ‘खेल’: पेड़ कटने से पहले सूचना दी नहीं, कटने के बाद पूछ रहे ‘किसने काटा?’
विशेष रिपोर्ट | बस्ती (उत्तर प्रदेश)
🎯 बस्ती में लकड़ी माफिया का तांडव: बंडा पोखरे पर कटे आधा दर्जन ‘देव वृक्ष’, सोता रहा वन विभाग
🎯 ‘पेड़ कट गए तो हम क्या करें?’: बंडा में बरगद के पेड़ों की बलि पर वन दरोगा का शर्मनाक बयान
🎯 पौधरोपण का ढोल, बरगद पर आरी: बंडा में सरेआम कटे हरे वृक्ष, सूचना के बाद भी सुध नहीं
🎯 माफिया का ‘आरा’, विभाग का ‘बहाना’: बस्ती में देव वृक्षों की कटान पर उठे गंभीर सवाल
🎯 बस्ती में ‘वन-रक्षकों’ की खुली पोल: जब कट रहे थे बरगद के पेड़, तब कहाँ सो रहा था प्रशासन?
बस्ती। प्रदेश सरकार एक तरफ करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर पौधरोपण अभियानों के ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि वन विभाग की नाक के नीचे हरे-भरे छायादार ‘देव वृक्षों’ की सरेआम बलि चढ़ाई जा रही है। ताजा मामला सदर वन रेंज बस्ती के बनकटी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बंडा का है, जहाँ पोखरे पर खड़े लगभग आधा दर्जन हरे-भरे बरगद के पेड़ों को लकड़ी माफियाओं ने खुलेआम काट डाला। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक और हैरान करने वाली भूमिका वन विभाग की रही है।

सूचना के बाद भी सोता रहा प्रशासन
ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों द्वारा जब बंडा पोखरे पर हरे वृक्षों की कटान की सूचना बनकटी के वन दरोगा को दी गई, तब भी जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे। माफिया बेखौफ होकर कुल्हाड़ियां और आरे चलाते रहे और वन विभाग मूकदर्शक बना रहा। नतीजा यह हुआ कि कई दशकों पुराने, पर्यावरण के प्रहरी और आस्था के केंद्र रहे बरगद के वृक्ष धराशायी कर दिए गए।
वन दरोगा का अजब-गजब तर्क:
जब इस गंभीर मामले पर बनकटी के वन दरोगा से जवाब माँगा गया, तो उनका बयान कानून-व्यवस्था और विभाग की कार्यप्रणाली का मजाक उड़ाने वाला था। साहब का फरमान था— “जब पेड़ों की कटान हो रही थी, तभी कार्रवाई शुरू की जा सकती थी। अब पेड़ काटे जा चुके हैं तो कैसे पता चलेगा कि पेड़ किसने काटा है, किस पर कार्रवाई करें?”
सवाल, जो विभाग की नीयत पर उंगली उठाते हैं
वन दरोगा का यह गैर-जिम्मेदाराना जवाब सीधे तौर पर लकड़ी माफियाओं को संरक्षण देने की बू पैदा करता है।
- क्या कटान के समय पुलिस या वन विभाग को मौके पर पहुँचना जरूरी नहीं था?
- क्या ग्राम पंचायत के सार्वजनिक पोखरे से रातों-रात या दिन-दहाड़े लकड़ी गायब हो गई और किसी को भनक तक नहीं लगी?
- जब आरोपी खुलेआम गांव और क्षेत्र में घूम रहे हैं, तो ‘अज्ञात’ का बहाना बनाकर जांच से पल्ला क्यों झाड़ा जा रहा है?
सार्वजनिक स्थल और ग्राम समाज की भूमि पर खड़े बरगद जैसे देव वृक्षों की बलि चढ़ जाने से जो पर्यावरणीय क्षति हुई है, उसकी भरपाई कोई भी विभाग नहीं कर सकता। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले इन भू-माफियाओं और लकड़ी तस्करों पर नकेल कौन कसेगा?
अब डीएफओ बस्ती से निष्पक्ष जांच की आस
वन दरोगा की कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर अब क्षेत्र के लोगों की नजरें जिले के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने जिले के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) से मांग की है कि:
- इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
- ग्राम पंचायत बंडा के पोखरे पर हुए इस अवैध पातन के मुख्य दोषियों और लकड़ी माफियाओं की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त विधिक कार्रवाई (FIR) की जाए।
- कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले और माफियाओं को परोक्ष संरक्षण देने वाले संबंधित वनकर्मियों पर भी कड़ा एक्शन लिया जाए।
अब देखना यह होगा कि वन विभाग अपने जिम्मेदार पदों पर बैठे ‘लापरवाह अफसरों’ को बचाता है या पर्यावरण के दुश्मनों को जेल के सलाखों के पीछे भेजता है।
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