पिता के वचन की मर्यादा निभाने राजमहल छोड़ वन को चले श्रीराम, पुत्र वियोग में तड़पे राजा दशरथ

महुली, सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_त्याग, तपस्या, कर्तव्य और मर्यादा का अनुपम संदेश देती राम वनवास लीला ने बुधवार की रात महुली के श्री राजा बरियार शाह खेल मैदान में श्रद्धा और भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। दुद्धी ब्लॉक के महुली में आयोजित 80वीं रामलीला के सातवें दिन स्थानीय कलाकारों ने राम वनवास के प्रसंगों का ऐसा सजीव मंचन किया कि दर्शक भावविभोर हो उठे। 
एक ओर महाराज दशरथ पुत्र वियोग की आशंका से व्याकुल नजर आए, तो दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजमहल के सुखों का त्याग कर वन जाने का निर्णय स्वीकार किया। माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ वन गमन के मार्मिक प्रसंग ने श्रद्धालुओं को श्रीराम के आदर्शों, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश दिया। मंच पर गूंजते संवादों और कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय के बीच जय श्रीराम के जयकारों से पूरा रामलीला मैदान गुंजायमान हो उठा।
रामलीला के सातवें दिन के मुख्य अतिथि जोरूखाड़ के ग्राम प्रधान विमल यादव रहे। कार्यक्रम के प्रारंभ में रामलीला समिति के अध्यक्ष अरविंद जायसवाल एवं कोषाध्यक्ष अमित कुमार कन्नौजिया ने मुख्य अतिथि को माला पहनाकर स्वागत एवं सम्मान किया। इसके बाद मुख्य अतिथि विमल यादव ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एवं जगत जननी माता सीता की आरती उतारी। पूजन-अर्चन के उपरांत रामलीला मंचन का शुभारंभ हुआ।
राम वनवास की कथा में दिखाया गया कि अयोध्या के महाराज दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को युवराज बनाने का निर्णय लेते हैं। राम के राज्याभिषेक की खबर से पूरी अयोध्या में उत्सव का माहौल बन जाता है। राजमहल से लेकर नगर की गलियों तक खुशियां छा जाती हैं। प्रजा अपने प्रिय राजकुमार के राजतिलक की प्रतीक्षा करने लगती है। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। राजमहल की दासी मंथरा को राम का राज्याभिषेक रास नहीं आता और वह रानी कैकेयी के मन में भरत के भविष्य को लेकर संदेह पैदा करने लगती है।
मंथरा की बातों में आकर कैकेयी का मन बदल जाता है। वह कोपभवन में चली जाती हैं। महाराज दशरथ जब उन्हें मनाने पहुंचते हैं तो कैकेयी उन्हें उस समय दिए गए दो वरदानों की याद दिलाती हैं, जब उन्होंने युद्ध में दशरथ की सहायता की थी। कैकेयी पहले वरदान में भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरे वरदान में श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगती हैं।
कैकेयी की यह मांग सुनते ही महाराज दशरथ के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। वह कैकेयी को समझाने और अपना निर्णय बदलने के लिए बार-बार विनती करते हैं, लेकिन कैकेयी अपने हठ पर अडिग रहती हैं। एक ओर राजा दशरथ का पुत्र प्रेम उन्हें भीतर से तोड़ रहा होता है, तो दूसरी ओर रघुकुल की वचन परंपरा उन्हें अपने वचन से पीछे हटने की अनुमति नहीं देती। राजा दशरथ की विवशता और पीड़ा के मंचन ने दर्शकों को भावुक कर दिया।
जब श्रीराम को वनवास की सूचना मिलती है, तो वह पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए सहर्ष वन जाने को तैयार हो जाते हैं। उनके लिए राजसिंहासन से बढ़कर पिता की आज्ञा और परिवार की प्रतिष्ठा होती है। श्रीराम के चेहरे पर न क्रोध होता है और न ही सत्ता से वंचित होने का कोई रोष। उनका यह त्याग दर्शकों के सामने आदर्श पुत्र और मर्यादा पुरुषोत्तम का स्वरूप प्रस्तुत करता है।
श्रीराम के वन जाने का निर्णय सुनकर माता सीता भी उनके साथ वन जाने का संकल्प लेती हैं। वह सुख-दुख में पति का साथ निभाने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करती हैं। वहीं अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम, समर्पण और सेवा भाव प्रकट करते हुए उनके साथ वन जाने का निर्णय लेते हैं। तीनों के वन गमन की तैयारी का दृश्य रामलीला का प्रमुख आकर्षण बना।
इसके बाद श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण राजसी सुख-सुविधाओं को छोड़कर वनवासी जीवन के लिए प्रस्थान करते हैं। दूसरी ओर महाराज दशरथ अपने प्रिय पुत्र को विदा करने की कल्पना मात्र से व्याकुल हो उठते हैं। राम के वन गमन का दृश्य मंच पर साकार होते ही वातावरण भावुक हो जाता है। श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयकारों के साथ प्रभु के आदर्शों को नमन किया।
राम वनवास लीला में महाराज दशरथ की भूमिका व्यास दिलीप कुमार कन्नौजिया, कैकेयी की भूमिका रजनीशमणि तथा मंथरा की भूमिका सुमित कुमार कन्नौजिया ने निभाई। तीनों कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय और प्रभावशाली संवादों से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। विशेष रूप से दशरथ की पुत्र वियोग की पीड़ा, कैकेयी के हठ और मंथरा की कुटिल चाल के प्रसंगों का जीवंत चित्रण दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
इस अवसर पर विश्वनाथ शर्मा, वीरेंद्र कुमार कन्नौजिया, कृष्णमुरारी, दया सोनी सहित रामलीला समिति के पदाधिकारी एवं सदस्य तथा क्षेत्र के हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे।
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