जिला रिपोर्टर सुरेश चौहान आगर मालवा मध्य प्रदेश शारदीय नवरात्रि पर विशेष कानड़ का मां हिंगलाज देवी मठ: तंत्र साधना, प्राचीन परंपरा और जनआस्था का अद्भुत संगम श्रद्धालुओं की अटूट आ

कानड़, आगर-मालवा।
मालवा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में कानड़ स्थित मां हिंगलाज देवी मठ का विशेष स्थान है। नलखेड़ा रोड पर नगर के मध्य स्थित यह प्राचीन मठ वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। तंत्र साधना, गायत्री उपासना और शाक्त परंपरा से जुड़ा यह स्थल अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के कारण अलग पहचान रखता है। स्थानीय मान्यताओं में इसे हिंगलाज माता की प्राचीन उपासना परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण सिद्धपीठ माना जाता है।
*पाकिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ से जुड़ी है मान्यता*
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर गिरे। मान्यता है कि इन स्थानों पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के निकट स्थित हिंगलाज माता मंदिर भी इसी परंपरा का प्रमुख शक्तिस्थल माना जाता है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, कानड़ का मां हिंगलाज देवी मठ भी इसी उपासना परंपरा से जुड़ा है। यही धार्मिक मान्यता इस मठ को क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व प्रदान करती है।
*स्वयंभू प्रतिमा और साधु-संतों की तपस्या की परंपरा*
मठ के गर्भगृह में विराजित मां हिंगलाज देवी की प्रतिमा को श्रद्धालु स्वयंभू मानते हैं। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, इस स्थान पर प्राचीन समय से साधु-संतों और सिद्ध साधकों की साधना परंपरा रही है। परिसर में मौजूद पुरानी समाधियां भी यहां की साधु-संत परंपरा की स्मृतियों को संजोए हुए हैं।
मठ की वर्तमान संरचना भले ही सीमित संसाधनों के बीच चद्दर की छत्रछाया में हो, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में माता के प्रति आस्था अटूट है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना माता की कृपा से पूर्ण होती है।
*नौ दिन अखंड ज्योत, दुर्गा सप्तशती और गायत्री मंत्र जाप*
शारदीय नवरात्रि के दौरान मां हिंगलाज देवी मठ में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मठ के पुजारी पंडित आशीष चतुर्वेदी के अनुसार, वर्षों पुरानी परंपरा के तहत अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को माता के समक्ष अखंड ज्योत प्रज्वलित की जाती है। इसके बाद पूरे नौ दिनों तक हवन-पूजन, दुर्गा सप्तशती एवं सरस्वती पाठ, गायत्री मंत्र जाप और तंत्रोक्त साधना का क्रम चलता है।
प्रतिदिन शाम को आरती के बाद बालिकाएं गरबा प्रस्तुत कर मां की आराधना करती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में माता का अलग-अलग स्वरूपों में विशेष शृंगार किया जाता है। सामान्य दिनों में भी सुबह-शाम आरती और भोग की परंपरा नियमित रूप से निभाई जाती है।
नवरात्रि के अवसर पर कानड़ सहित आगर-मालवा, शाजापुर, राजगढ़, उज्जैन और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
*अतिक्रमण मुक्त जमीन से बदल सकती है मठ की तस्वीर*
प्राचीन धार्मिक विरासत को भव्य स्वरूप देने के लिए स्थायी मंदिर निर्माण और संरक्षण की आवश्यकता है। मठ के पुजारी पंडित आशीष चतुर्वेदी और कानड़ निवासी पत्रकार दारा सिंह के अनुसार, मंदिर परिसर की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराकर उसके वैधानिक उपयोग से प्राप्त होने वाली आय को मठ के विकास, भव्य निर्माण और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटाने में लगाया जा सकता है।
उनका कहना है कि यदि इस दिशा में गंभीरता से प्रयास किए जाएं तो मठ को व्यवस्थित और भव्य स्वरूप दिया जा सकता है। इससे न केवल प्राचीन धार्मिक धरोहर का संरक्षण होगा, बल्कि कानड़ को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर भी नई पहचान मिल सकती है।
*आस्था के साथ संरक्षण भी जरूरी*
मां हिंगलाज देवी मठ केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि मालवा की लोक आस्था, धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। आवश्यकता है कि इस प्राचीन स्थल के संरक्षण, स्थायी मंदिर निर्माण और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार की दिशा में पहल की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस धार्मिक धरोहर से जुड़ सकें।
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