मंदोदरी की सीख ठुकराई, अंगद की ललकार से कांपा रावण दरबार

मंदोदरी की सीख ठुकराई, अंगद की ललकार से कांपा रावण दरबार
महुली की 80वीं रामलीला के ग्यारहवें दिन विभीषण की शरणागति से गूंजी प्रभु श्रीराम की करुणा, तो अंगद-रावण के ओजस्वी संवाद ने दर्शकों में भरा जोश; अहंकार और धर्म के संघर्ष का हुआ जीवंत मंचन
महुली, सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_दुद्धी ब्लॉक के श्री राजा बरियार शाह खेल मैदान महुली में आयोजित 80वीं रामलीला के ग्यारहवें दिन विभीषण शरणागत एवं अंगद-रावण संवाद की लीला का शानदार मंचन किया गया। रामायण पूजन और प्रभु श्रीराम की आरती के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
इसके बाद स्थानीय कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय, प्रभावशाली संवाद और भावपूर्ण प्रस्तुतियों से रामकथा के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। पूरा रामलीला मैदान जय श्रीराम के उद्घोष से गुंजायमान रहा।
लीला में सर्वप्रथम स्वर्णनगरी लंका का दृश्य प्रस्तुत किया गया, जहां महारानी मंदोदरी रावण को उसके अहंकार और अधर्म के दुष्परिणामों से आगाह करती हैं। वह रावण को समझाती हैं कि प्रभु श्रीराम से शत्रुता करना स्वयं विनाश को आमंत्रण देना है।
मंदोदरी कहती हैं कि माता सीता को ससम्मान लौटाकर श्रीराम से क्षमा मांग लेना ही लंका और राक्षस कुल के हित में है। लेकिन सत्ता, शक्ति और अभिमान में डूबा रावण उनकी बातों को अनसुना कर देता है।
मंदोदरी की चिंता और रावण के अहंकार के बीच हुए संवाद ने दर्शकों का ध्यान खींचा। इसके बाद रावण के छोटे भाई विभीषण उसे अधर्म का मार्ग छोड़ने और माता सीता को लौटाने की सलाह देते हैं।
रावण क्रोधित होकर विभीषण का अपमान करता है और उन्हें लंका से निष्कासित कर देता है। धर्म और सत्य का साथ निभाने का संकल्प लेकर विभीषण प्रभु श्रीराम की शरण में पहुंचते हैं।
वानर सेना में संशय उत्पन्न होने पर प्रभु श्रीराम स्पष्ट करते हैं कि जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा करना उनका धर्म है। श्रीराम विभीषण को अपनाकर उन्हें अभयदान देते हैं।
इस प्रसंग में प्रभु की उदारता, करुणा और शरणागत वत्सलता का मनोहारी चित्रण हुआ। इसके पश्चात श्रीराम की ओर से युवराज अंगद को रावण के दरबार में अंतिम संदेश लेकर भेजा जाता है।
अंगद निर्भीक होकर रावण को समझाते हैं कि अभी भी समय है, वह माता सीता को लौटा दे और युद्ध का मार्ग छोड़कर अपने कुल तथा लंका को विनाश से बचा ले। रावण अपनी शक्ति का घमंड दिखाते हुए अंगद का उपहास करता है।
जवाब में अंगद उसके अहंकार को ललकारते हुए कहते हैं कि वीरता निर्बलों को सताने में नहीं, बल्कि धर्म का सम्मान करने में है। अंगद रावण की सभा में अपना पैर जमा देते हैं और चुनौती देते हैं कि यदि लंका का कोई वीर उनका पैर हटा दे, तो श्रीराम की सेना लौट जाएगी।
रावण के शक्तिशाली योद्धा और दरबारी भरसक प्रयास करते हैं, लेकिन कोई सफल नहीं होता। अंततः रावण स्वयं आगे बढ़ता है तो अंगद उसे रोकते हुए कहते हैं कि यदि झुकना ही है, तो प्रभु श्रीराम के चरणों में झुको।
यह सुनकर सभा में सन्नाटा छा जाता है। अंगद का यह ओजस्वी संवाद दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण बना।
इसके बाद अंगद रावण को अंतिम चेतावनी देकर श्रीराम के पास लौट जाते हैं। राम की भूमिका अमरेश कुमार कन्नौजिया, लक्ष्मण की निखिल कुमार कन्नौजिया, हनुमान की कृष्ण मुरारी कन्नौजिया, सुग्रीव की शिवनारायण शर्मा, जामवंत की दया सोनी, रावण की डॉ.
राकेश कुमार कन्नौजिया, मंदोदरी की सुमित कुमार कन्नौजिया, अंगद की विंध्याचल प्रसाद कन्नौजिया, मेघनाद की शैलेश कुमार कन्नौजिया तथा समुद्र देव की भूमिका उपमहंत प्रेमचंद कन्नौजिया ने निभाई। अन्य कलाकारों ने भी विभिन्न पात्रों का प्रभावशाली अभिनय किया।
रामलीला के व्यास दिलीप कुमार कन्नौजिया, निर्देशक विश्वनाथ शर्मा, महंत दयाराम कन्नौजिया, ढोलक वादक मुन्ना भारती और झाल वादक शेषमन कन्नौजिया ने मंचन को प्रभावशाली बनाया। इस अवसर पर रामलीला समिति के अध्यक्ष अरविंद जायसवाल, उपाध्यक्ष वीरेंद्र कुमार कन्नौजिया, कोषाध्यक्ष अमित कुमार कन्नौजिया सहित समिति के अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।
लीला ने दिया संदेश: अहंकार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है। विभीषण की शरणागति और अंगद की निर्भीकता ने इसी शाश्वत संदेश को दर्शकों के हृदय तक पहुंचाया।
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