सनातन धर्म के संरक्षण और सास्कृतिक चेतना के विकास में सभी अपनी भूमिका निभाएं, प्रेमचंद झा

सनातन धर्म के संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के विकास में सभी निभाएं भूमिका : प्रेमचन्द्र झा
रूपईडीहा बहराइच। जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य महाराज के शिष्य एवं कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व अधिवक्ता प्रेमचन्द्र झा इन दिनों नेपाल भ्रमण पर हैं। नेपाल के करीब 25 जिलों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा के दौरान उन्होंने विभिन्न धार्मिक अगुवाओं, धर्मगुरुओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध व्यक्तियों से मुलाकात कर सनातन धर्म एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर विचार-विमर्श किया।
इसी क्रम में नेपालगंज पहुंचने पर प्रेमचन्द्र झा ने सनातन धर्म के संरक्षण, धार्मिक आस्थाओं के सम्मान और हिंदू सांस्कृतिक चेतना के विकास के लिए सभी सनातनी हिंदुओं से एकजुट होकर अपनी जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म सभी धर्मों, संस्कृतियों और आस्थाओं का सम्मान करने की परंपरा रखता है। समाज में आपसी सद्भाव, धार्मिक सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना बनाए रखते हुए अपनी धार्मिक मान्यताओं एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी आवश्यक है।
उन्होंने भारत और नेपाल दोनों देशों में हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना के समर्थन में अपनी विचारधारा व्यक्त करते हुए कहा कि सनातन धर्म के संरक्षण और हिंदू आस्था के संवर्धन के लिए धर्मगुरुओं, धार्मिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा प्रत्येक सनातनी को अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
झा ने विशेष रूप से परिवारों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही हनुमान चालीसा, श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण सहित धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कराना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से परिचित हो सके। संस्कारयुक्त शिक्षा से बच्चों में अनुशासन, नैतिकता और सांस्कृतिक पहचान का विकास होता है।
कार्यक्रम में अधिवक्ता विश्वजीत तिवारी, विश्व हिंदू परिषद के कर्णाली प्रदेश अध्यक्ष कृष्णमुरली भट्ट, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) के नगर अध्यक्ष शिवराज वर्मा, वार्ड नंबर नौ के अध्यक्ष विवेक तथा नेपाल-भारत जनमैत्री संगठन के लुम्बिनी प्रदेश अध्यक्ष सुमन धिमाल सहित विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोग मौजूद रहे।
इस दौरान उपस्थित लोगों ने सनातन धर्म के संरक्षण, धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए आपसी सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए।
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