जिला रिपोर्टर सुरेश चौहान आगर मालवा मध्य प्रदेश सालरिया का कामधेनु गौ-अभयारण्य: 8 हजार गोवंश का सहारा बना देश का पहला शासकीय गौ-अभयारण्य 472 हेक्टेयर में फैला संरक्षण का अनूठा केंद

आगर-मालवा। गोवंश संरक्षण को केवल सरकारी योजना तक सीमित न रखते हुए उसे संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में मध्यप्रदेश ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। आगर-मालवा जिले की सुसनेर तहसील के ग्राम सालरिया में स्थापित देश का प्रथम शासकीय कामधेनु गौ-अभयारण्य आज इस प्रयास का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। करीब 472 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत इस अभयारण्य में 7,900 से अधिक गोवंश की देखभाल और संरक्षण किया जा रहा है। निराश्रित, वृद्ध और दूध देने की क्षमता खो चुके गोवंश को आश्रय देने के उद्देश्य से स्थापित यह केंद्र अब गौ-संवर्धन, अनुसंधान और गौ-आधारित अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को भी आगे बढ़ा रहा है।
*2008 में परिकल्पना, 2017 में शुरू हुआ संचालन*
जिला मुख्यालय आगर से लगभग 50 किलोमीटर दूर ग्राम सालरिया में इस महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा की गई थी। 24 दिसंबर 2012 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसका भूमि पूजन किया। वर्ष 2013 में निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ तथा 2016 में निर्माण पूरा होने के बाद सितंबर 2017 में इसका विधिवत संचालन शुरू हुआ। लगभग 32 करोड़ रुपये की लागत से विकसित यह अभयारण्य 472 हेक्टेयर राजस्व भूमि पर संचालित है। इसमें करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्र को चारागाह के रूप में विकसित किया गया है।
*6 हजार की निर्धारित क्षमता, संरक्षण में 7,900 से अधिक गोवंश*
अभयारण्य की निर्धारित क्षमता एक साथ 6 हजार गोवंश को आश्रय देने की है, लेकिन वर्तमान में यहां 7,900 से अधिक गोवंश संरक्षित हैं। इनके आवास और देखभाल के लिए 24 विशाल शेड निर्मित किए गए हैं। प्रत्येक शेड में 240 से 250 गोवंश को रखने की व्यवस्था है। पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पांच बोरवेल, तालाब और अन्य जल संरचनाएं विकसित की गई हैं।
परिसर में प्रशासनिक भवन, कर्मचारी आवास, कृषक प्रशिक्षण केंद्र, गौ-अनुसंधान केंद्र, भूसा भंडारण के लिए दस विशाल गोदाम, बायोगैस संयंत्र और सोलर प्लांट जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी तथा वन विभाग के सहयोग से यहां उन्नत किस्म की घास का उत्पादन भी किया जा रहा है।
*गौ-संरक्षण के साथ उत्पादन और अनुसंधान पर जोर*
कामधेनु गौ-अभयारण्य की अवधारणा इसे पारंपरिक गौशाला से अलग पहचान देती है। इसका उद्देश्य गोवंश को आश्रय उपलब्ध कराने के साथ उससे प्राप्त संसाधनों का वैज्ञानिक और उपयोगी तरीके से सदुपयोग करना भी है। इसी दृष्टि से यहां पंचगव्य आधारित उत्पादों के अनुसंधान और उत्पादन की योजना तैयार की गई है।
गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी से आयुर्वेदिक औषधियां, साबुन, शैम्पू, अगरबत्ती, जैविक कीटनाशक, जैव उर्वरक और वर्मी कम्पोस्ट जैसे उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं विकसित की जा रही हैं। गोमूत्र अर्क निकालने के लिए मशीनें और आसवन संयंत्र भी स्थापित किए गए हैं। इस पहल के पीछे मूल विचार गोवंश को कृषि, जैविक उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना है।
*पथमेड़ा की संस्था संभाल रही प्रबंधन की जिम्मेदारी*
अभयारण्य की नोडल एजेंसी मध्यप्रदेश गौपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड है। इसके सुचारू संचालन और पेशेवर प्रबंधन के लिए मध्यप्रदेश शासन ने टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से राजस्थान की अनुभवी संस्था श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा को जिम्मेदारी सौंपी है। संचालन व्यवस्था के लिए राज्य, जिला और संस्था स्तर पर त्रिस्तरीय संचालन मंडल गठित किए गए हैं। राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव तथा जिला स्तर पर कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीना की अध्यक्षता में संचालन की निगरानी की जाती है। शासन द्वारा प्रति गोवंश निर्धारित अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। पशुओं की देखभाल और उपचार के लिए उप संचालक, पशु चिकित्सक तथा सहायक पशु चिकित्सा अधिकारियों का अमला भी पदस्थ है।
*गौ-कैबिनेट की पहली बैठक से जुड़ा ऐतिहासिक महत्व*
सालरिया स्थित इस अभयारण्य को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान तब मिली, जब मध्यप्रदेश शासन द्वारा गठित देश की प्रथम गौ-कैबिनेट की पहली बैठक 22 नवंबर 2020 को गोपाष्टमी के अवसर पर इसी परिसर में आयोजित की गई। इस आयोजन ने कामधेनु गौ-अभयारण्य को प्रदेश की गौ-संरक्षण नीति के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित किया।
*गौ-सेवा से आत्मनिर्भरता तक का मॉडल*
कामधेनु गौ-अभयारण्य सालरिया की पहचान केवल हजारों गोवंश को आश्रय देने वाले केंद्र के रूप में नहीं है। यह गोवंश संरक्षण, देशी नस्लों के संवर्धन, जैविक कृषि, अनुसंधान और ग्रामीण रोजगार की संभावनाओं को एक साथ जोड़ने वाली पहल भी है। गोबर और गोमूत्र जैसे संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग, जैविक उत्पादों का निर्माण तथा कृषकों को प्रशिक्षण देकर इस मॉडल को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
*मध्यप्रदेश की यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि गोवंश संरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए केवल आश्रय उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, पर्याप्त चारा-पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं और आर्थिक रूप से टिकाऊ व्यवस्था भी आवश्यक है। सालरिया का कामधेनु गौ-अभयारण्य इसी व्यापक सोच के साथ प्रदेश में गौ-सेवा और संरक्षण की एक विशिष्ट पहचान बना रहा है।*
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