3 साल की गारंटी, 1 साल में ही अंधेरा: कमीशनखोरी के उजाले में डूबी बस्ती नगर पालिका!

अजीत मिश्रा (खोजी)
नगर पालिका बस्ती: 3 साल की ‘गारंटी’ पर 1 साल में लगा अंधेरा, कमीशनखोरी की आँच में जल गई जनता की उम्मीदें!
- दावे तीन साल के, स्ट्रीट लाइटें एक साल में ढेर: आखिर किसकी जवाबदेही तय करेगा प्रशासन?
- बस्ती नगर पालिका में भ्रष्टाचार का अंधेरा: वारंटी वाली लाइटें बनीं कबाड़, जिम्मेदार मौन!
- कमीशन के खेल में डूबा शहर, 3 साल की वारंटी वाली लाइटें 1 साल में फेल!
- नगर पालिका बस्ती का कारनामा: कागजों पर रोशनी, जमीन पर भ्रष्टाचार का अंधेरा!
- वारंटी का ढकोसला या भ्रष्टाचार का खेल? एक साल में ही बुझ गईं नगर पालिका की लाइटें!
बस्ती। विकास के लंबे-चौड़े दावों और कागजी गारंटियों की हवा कैसे निकाली जाती है, इसका जीता-जागता नमूना देखना हो तो बस्ती नगर पालिका की सड़कों पर निकल आइए। जिन स्ट्रीट लाइटों की रोशनाई पर नगर पालिका प्रशासन ने वाहवाही लूटी थी और ठेकेदारों को बजट का भारी-भरकम भुगतान किया गया था, वे महज 1 साल के भीतर ही दम तोड़ चुकी हैं। सवाल यह उठता है कि जब इन स्ट्रीट लाइटों की वारंटी पूरे 3 साल की थी, तो 12 महीने में ही शहर अंधकार में क्यों डूब गया? और सबसे बड़ा सवाल—आखिर इस घोर लापरवाही और वित्तीय अनिमितता के लिए नगर पालिका प्रशासन किसकी जवाबदेही तय करेगा?

कागजों पर रोशनी, जमीन पर अंधेरा
नगर पालिका बस्ती क्षेत्र की गलियों और मुख्य मार्गों को रोशन करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से नई स्ट्रीट लाइटें लगवाई गई थीं। खरीद प्रक्रिया के दौरान बड़ी-बड़ी बातें की गईं—दावा था कि लाइटें उच्च गुणवत्ता की हैं और 3 साल की ऑन-साइट वारंटी के साथ आती हैं। यानी, अगर 3 साल में लाइट खराब होती है तो संबंधित कंपनी या ठेकेदार को उसे अपने खर्चे पर तुरंत बदलना या ठीक करना होगा।
लेकिन हकीकत? महज एक साल के भीतर शहर के कई वार्डों में लगीं स्ट्रीट लाइटें शो-पीस बनकर रह गई हैं। रात होते ही गलियों में पसरा अंधेरा न केवल नगर पालिका के विकास के दावों का मुंह चिढ़ाता है, बल्कि स्थानीय निवासियों और राहगीरों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
कमीशनखोरी की भेंट चढ़ी गुणवत्ता?
स्थानीय जनता और समाजसेवियों का सीधा आरोप है कि नगर पालिका बस्ती इस समय भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के दलदल में धंसी हुई है। जब तक टेंडर प्रक्रिया और खरीदारी में भारी कमीशन का खेल चलता रहेगा, तब तक घटिया सामान की सप्लाई रुक ही नहीं सकती।
आरोप हैं कि:
- घटिया सामग्री की खरीद: 3 साल की वारंटी का ठप्पा लगाकर जनता की गाढ़ी कमाई से घटिया क्वालिटी की लाइटें खरीदी गईं।
- वारंटी क्लॉज की अनदेखी: जब लाइटें खराब हुईं, तो वारंटी की शर्तों के तहत ठेकेदार या कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने या उनसे काम कराने के बजाय जिम्मेदार मौन साधे बैठे हैं।
- पेमेंट की हड़बड़ी: कमीशन का हिस्सा जेब में आते ही बिना किसी ठोस सत्यापन (Quality Audit) के ठेकेदारों की फाइलें पास कर दी गईं।
आखिर कब तय होगी जवाबदेही?
अगर वारंटी 3 साल की है, तो 1 साल में लाइटें खराब होने पर संबंधित कंपनी या ठेकेदार पर पेनल्टी क्यों नहीं लगाई गई? उन्हें नोटिस भेजकर लाइटें बदलने का दबाव क्यों नहीं बनाया जा रहा? क्या नगर पालिका प्रशासन का काम सिर्फ बजट ठिकाने लगाना और टेंडर जारी करना भर रह गया है?
जनता यह जानने को बेताब है कि:
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की सांठगांठ के बिना यह घटिया सप्लाई संभव थी?
- क्या उन अफसरों की जवाबदेही तय होगी, जिन्होंने घटिया सामान को पास कर भुगतान का हरी झंडी दिखाई?
- या फिर हमेशा की तरह फाइलें धूल फांकती रहेंगी और जनता अंधेरे में ठोकरें खाने को मजबूर रहेगी?
जनता मांग रही हिसाब
नगर पालिका बस्ती के आला हुक्मरानों को यह समझना होगा कि यह जनहित का पैसा है, किसी की निजी जागीर नहीं। अगर जल्द ही बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत या बदलाई वारंटी क्लॉज के तहत नहीं कराई गई और दोषी ठेकेदारों व अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो बस्ती की सड़कों पर उतरकर जनता इस भ्रष्टाचार का हिसाब मांगने से पीछे नहीं हटेगी।
अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया नगर पालिका प्रशासन जागकर कोई कार्रवाई करता है या कमीशन के उजाले में शहर के अंधेरे को नजरअंदाज करता रहेगा।
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