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आरोपी: आज़ाद पत्रकार: कठघरे में?? संदेश साफ है— जो सत्य का साथ देगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी

सिस्टम किसके पक्ष में खड़ा है? सत्य के? या उस झूठ के… जो सत्ता की छाया में पलता है?

कानून की कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवाल —

जब सच बोलने वाला कठघरे में और आरोपी आज़ाद घूमे, तो समझिए सिस्टम “ब्लैकआउट मोड” में है! **

दो महीने से जांच गायब — अब पत्रकार को ही कोर्ट में घसीटा जा रहा है!

कहानी किसी फिल्म की नहीं…
ये हकीकत है—और इतनी कड़वी कि लोकतंत्र तक का स्वाद बदल जाए।

जहाँ अजय तिवारी जैसे आरोपी पर कार्रवाई होनी थी,
वहाँ दो महीने बीत चुके, पर—
न रिपोर्ट,
न जांच,
न प्रगति,
न पूछताछ।

फाइलें ऐसे बंद हैं जैसे किसी अदृश्य हाथ ने सिस्टम की रफ़्तार को लॉक कर दिया हो।

और दूसरी तरफ—
जिस पत्रकार ने सच की कलम से आवाज़ उठाई…
उसे ही कोर्ट में पेश होने की नोटिस थमा दी गई।
जैसे अपराध उसकी कलम ने किया,
ना कि आरोपी की हरकतों ने।

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर प्रहार — “सच लिखोगे तो सज़ा मिलेगी?”

इतिहास, किताबें और फिल्में बताती थीं कि—
कानून अंधा होता है।
आज यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं—
चलती-फिरती वास्तविकता बन गया है।
लेकिन आज की विडंबना इससे भी आगे है—
कानून अंधा ही नहीं,
बहिरा भी हो गया है— पत्रकार की आवाज़ सुन नहीं पा रहा।
गूंगा भी हो गया है— अन्याय पर कुछ कह नहीं पा रहा।
और यही है सबसे बड़ा डर—
जब कानून चुप हो जाता है,
तो अपराध बोलने लगता है।
सबसे बड़ा सवाल: सिस्टम किसके पक्ष में खड़ा है?

सत्य के? या उस झूठ के…
जो सत्ता की छाया में पलता है?

क्योंकि
शराब के नशे में लिखवाई गई एफआईआर तुरंत मान्य
पत्रकार की शिकायत “अस्वीकार्य”
यह कैसा न्याय?
यह कैसी प्राथमिकता?

आरोपी आज़ाद… और पत्रकार कोर्ट में – यह किसका शासन मॉडल है?

सोचिए…
आरोपी खुली हवा में घूम रहा है
कोई पूछताछ नहीं
कोई दबाव नहीं
कोई कार्रवाई नहीं

और उधर—
पत्रकार को कोर्ट के चक्कर
पूछताछ जैसे वह ही आरोपी हो
गवाही, कागज़ात, नोटिसेस

यह कैसा सिस्टम है, जहाँ अपराधी की राह आसान, और सत्य बोलने वाले की राह कठिन बनाई जाती है?
“सिस्टम की चुप्पी”—सबसे बड़ा अपराध

लगभग दो महीने बीत गए।
पर न आवाज़, न जवाबदेही, न गति।

ऐसा लगता है—
कानून की फाइलों पर नहीं,
न्याय पर ताला लगा दिया गया हो।

लोग पूछने लगे हैं—

क्या सच लिखना ही सबसे बड़ा गुनाह बन गया है?
क्या पत्रकारिता “अपराध की विभागीय सूची” में जोड़ दी गई है?
क्या अब न्याय सिर्फ कुछ लोगों का निजी अधिकार है?
**जब न्याय की धार कुंद हो जाती है,

तो अन्याय तलवार की तरह तेज़ हो जाता है।**

आरोपी: आज़ाद
पत्रकार: कठघरे में

यह दृश्य किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद हिला सकता है।

क्योंकि संदेश साफ है—
जो सत्य का साथ देगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी।
*निष्कर्ष — यह लड़ाई सिर्फ एक पत्रकार की नहीं,
यह लड़ाई न्याय की आत्मा को बचाने की है**

*आज जो हुआ—
वह सिर्फ एक घटना नहीं,
यह चेतावनी है।*

अगर आज भी सिस्टम ने अपनी बंद आँखें नहीं खोली…
अगर कान नहीं खोले…
अगर न्याय का तराज़ू संतुलित नहीं हुआ…
तो आने वाले दिनों में—
न्याय सिर्फ किताबों में मिलेगा,
और सत्य बोलने वाले—कटघरे में।

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