लापरवाही की इंतेहा: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) अमरौली शुमाली से 17 जून को भेजा गया बलगम का नमूना, 21 जुलाई तक भी नहीं हुई जांच।
यह इकलौता मामला नहीं है। बस्ती के कई ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर जांच मशीनें शो पीस बनी हुई हैं या फिर कर्मचारी अपनी मनमानी पर उतारू हैं। यदि समय रहते इस प्रकार की लापरवाही पर सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो गरीब मरीजों का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य सेवाओं का शर्मनाक सच: 37 दिन बाद भी बलगम की रिपोर्ट गायब, किसकी जान से खेल रहा है बस्ती का स्वास्थ्य विभाग?
- मरीज की जिंदगी से खिलवाड़: रिपोर्ट समय पर न मिलने के कारण मरीज को नहीं मिल सका समय पर उचित उपचार, स्थानीय लोगों में रोष।
- अधिकारियों की नींद खुली: मामला तूल पकड़ने के बाद CHC सल्टौआ के अधीक्षक ने संबंधित संविदा लैब टेक्नीशियन (एलटी) को जारी किया कारण बताओ नोटिस।
- दो दिन में मांगा गया स्पष्टीकरण: संतोषजनक जवाब न मिलने पर विभागीय कार्रवाई और जुलाई महीने का मानदेय रोकने की दी गई चेतावनी।
- ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल: क्षेत्र के नागरिकों ने जांच प्रक्रिया की समयबद्धता पर उठाए सवाल, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की मांग।
बस्ती जिले के विकास खंड सल्टौआ गोपालपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) अमरौली शुमाली से सामने आया ताज़ा मामला हमारे स्वास्थ्य तंत्र की खोखली और संवेदनहीन व्यवस्था का जीता-जागता सुबूत है। जिस स्वास्थ्य विभाग के कंधों पर बीमारों को जीवनदान देने की जिम्मेदारी है, वही विभाग कागजी खानापूर्ति और सुस्ती के चलते मरीजों के लिए यमराज साबित हो रहा है।
क्या किसी भी सभ्य समाज में यह कल्पना की जा सकती है कि बलगम जैसी सामान्य जांच की रिपोर्ट आने में 37 दिन का लंबा वक्त लग जाए?
लापरवाही की इंतेहा: 17 जून का नमूना, 21 जुलाई तक सन्नाटा
शिकायतकर्ता पवन कुमार मोदनवाल द्वारा उठाए गए इस गंभीर मामले के अनुसार, 17 जून 2026 को CHC अमरौली शुमाली से एक मरीज का बलगम का नमूना जांच के लिए CHC सल्टौआ भेजा गया था। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि 21 जुलाई 2026 बीत जाने के बाद भी न तो रिपोर्ट आई और न ही मरीज को कोई इलाज मिल सका।
”37 दिनों का यह विलंब सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी के साथ सीधा खिलवाड़ है।”
कारण बताओ नोटिस: महज़ लीपापोती या कड़ा कदम?
मामला तूल पकड़ने और मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद CHC सल्टौआ के अधीक्षक की नींद खुली है और संबंधित संविदा लैब टेक्नीशियन (एलटी) को कारण बताओ नोटिस जारी कर दो दिन में जवाब मांगा गया है। साथ ही जुलाई 2026 का मानदेय रोकने की चेतावनी दी गई है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ एक नोटिस थमा देने से उस मरीज की भरपाई हो जाएगी, जिसने समय पर इलाज न मिलने के कारण डेढ़ महीने तक दर्द और अनिश्चितता झेली होगी? क्या संविदा कर्मियों पर हल्की-फुल्की कार्रवाई करके उच्च अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकते हैं? यह घटना इस बात का प्रमाण है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की मॉनिटरिंग पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।
व्यवस्था पर बड़े सवाल:
- समयबद्धता का मज़ाक: जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और अन्य योजनाओं के तहत त्वरित जांच और इलाज के दावे किए जाते हैं, तो एक महीने से ज्यादा समय तक एक रिपोर्ट दबा कर बैठना किस बात की ओर इशारा करता है?
- जिम्मेदारी से भगोड़ापन: क्या स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात लापरवाह कर्मियों को आम जनता की जान की कोई कीमत नहीं है?
- जिले के उच्च अधिकारियों की चुप्पी: बस्ती के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और अन्य जिम्मेदार अधिकारी ऐसी व्यवस्था पर लगाम कसने में क्यों नाकाम साबित हो रहे हैं?
जनता की मांग: अब सुधरनी चाहिए व्यवस्था
यह इकलौता मामला नहीं है। बस्ती के कई ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर जांच मशीनें शो पीस बनी हुई हैं या फिर कर्मचारी अपनी मनमानी पर उतारू हैं। यदि समय रहते इस प्रकार की लापरवाही पर सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो गरीब मरीजों का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।
वक्त आ गया है कि स्वास्थ्य प्रशासन कागजी नोटिसों के खेल से बाहर निकले और अमरौली शुमाली व सल्टौआ CHC जैसी जगहों पर पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध जांच प्रणाली सुनिश्चित करे, ताकि भविष्य में किसी अन्य मरीज को अपनी रिपोर्ट के लिए महीनों धक्के न खाने पड़ें।






















