बस्ती में ‘आपदा में अवसर’: सरयू-घाघरा का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंचते ही बाढ़ खंड में शुरू हुआ पुराना ‘बोरी का खेल’।

अजीत मिश्रा (खोजी)
बाढ़, भ्रष्टाचार और ‘बोरी का खेल’: बस्ती में आपदा महकमा बना आफत का सौदागर
- कागजों में विकास, धरातल पर रेत: तटबंधों की सुरक्षा और पिचिंग के नाम पर करोड़ों के बजट का दुरुपयोग, ग्रामीण लगा रहे बड़े भ्रष्टाचार के आरोप।
- अनोखा ‘एआई घोटाला’: बस्ती मंडल में कागजों पर ही तटबंध चमकाने और एक करोड़ से अधिक का बजट डकारने का मामला आया सामने।
- वेतन घोटाले से लेकर बारदाना हेरफेर तक: बाढ़ खंड प्रथम में 1.25 करोड़ के गोलमाल के बाद अब बाढ़ सुरक्षा कार्यों में भी अनियमितताओं की गूंज।
बस्ती: प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो गरीबों की गृहस्थी उजड़ जाती है, खेत बह जाते हैं और जिंदगी संघर्ष की पटरी पर आ जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में सरयू-घाघरा की उफनती लहरें गरीब के लिए भले ही मौत और बर्बादी का पैगाम लेकर आती हों, किंतु बाढ़ खंड के ‘साहब लोगों’ के लिए यह हर साल की तरह इस बार भी ‘आपदा में अवसर’ बन गई है। नदी का जलस्तर खतरे के निशान को पार क्या करता है, महकमे की तिजोरियां भरने के लिए पुराना और अचूक ‘बोरी का खेल’ पूरी शान के साथ शुरू हो जाता है।
कागजी घोड़े और हकीकत की रेत
बस्ती में सरयू नदी का खतरा निशान 92.730 मीटर निर्धारित है। पिछले दिनों केंद्रीय जल आयोग और अन्य रिपोर्टों ने साफ कर दिया कि जलस्तर खतरे के निशान से 15 सेमी से लेकर 56 सेमी तक ऊपर बह रहा है। जिले की दक्षिणी सीमा पर घाघरा की तबाही हर साल दो दर्जन से अधिक गांवों को नेस्तनाबूद करने पर आमादा रहती है।
मगर इन उफनती धाराओं के बीच असली तबाही नदी नहीं, बल्कि बाढ़ विभाग के दफ्तरों में रची जा रही है। एक तरफ जहां बाढ़ खंड प्रथम के अधिशासी अभियंता कार्यालय में वेतन के नाम पर 1,25,41,987 रुपये के बड़े गोलमाल का मामला उजागर हो चुका है और मुकदमे दर्ज हो रहे हैं, वहीं तटबंधों की सुरक्षा के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई को पानी में बहाया जा रहा है।
’बोरी के खेल’ का नायाब गणित
ग्रामीणों के अनुसार, बाढ़ सुरक्षा के नाम पर चल रहा यह खेल किसी बड़े संगठित सिंडिकेट से कम नहीं है, जिसकी कार्यप्रणाली कुछ इस तरह है:
- कागज पर दस हजार, मौके पर दो हजार: कागजी दस्तावेजों में किसी कमजोर स्पर को बचाने के लिए 10,000 बोरियां डालने का दावा किया जाता है, जबकि जमीन पर बमुश्किल 2,000 से 3,000 बोरियां ही फेंकी जाती हैं।
- एक ही बोरी का बहुपयोग: जो बोरियां पानी के तेज बहाव में बह जाती हैं या फट जाती हैं, उन्हें निकालकर फिर से रेत-मिट्टी से भरा जाता है और दूसरे स्थानों पर नया एस्टीमेट बनाकर दोबारा खपा दिया जाता है।
- आधुनिक ‘एआई’ घोटाला: बस्ती मंडल में तो भ्रष्टाचार ने तकनीकी छलांग लगा ली है। यहां कागजों पर ही ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की मदद से तटबंधों को ऐसा चमकाया गया कि 1 करोड़ से अधिक का बजट कागजों में ही डकार लिया गया।
वर्तमान में सोनौली-मोहम्मदपुर क्षेत्र में 6 स्परों के रेस्टोरेशन का काम चल रहा है, जिसका निरीक्षण खुद मंडलायुक्त कर चुकी हैं। लेकिन जनता का दर्द जस का तस है—निरीक्षण के नाम पर महज खानापूरी और धरातल पर वही पुरानी रेत से भरी फटी बोरियों का दिखावा।
आंकड़ों की जुबानी भ्रष्टाचार की दास्तान
- खतरे का निशान: 92.730 मीटर (वर्तमान में जलस्तर इससे काफी ऊपर)।
- सीधे प्रभावित क्षेत्र: सरयू तटबंध के भीतर बसे दो दर्जन से अधिक गांव।
- महकमे के काले कारनामे: बाढ़ खंड प्रथम में 1.25 करोड़ का वेतन घोटाला और 1 करोड़ से अधिक का फर्जी तटबंध बजट।
- व्यापक पैटर्न: प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी 33,850 बोरियों और लाखों रुपये के बारदाना हेरफेर के मामले पहले ही सामने आ चुके हैं।
बड़ा सवाल: बंधे बच रहे हैं या तिजोरियां?
जब हर साल सरयू की मुख्य धारा टेढ़ी नदी से मिलकर बीडी बांध और पंप कैनाल के अस्तित्व को पूरी तरह निगलने को आतुर है, तब प्रशासन का सारा जोर सिर्फ बोरियों की खरीद-फरोख्त पर क्यों है?
बस्ती की जनता आज त्राहिमाम कर रही है और पूछ रही है कि क्या इन बोरियों से सचमुच उनके आशियाने बचाए जा रहे हैं, या इन फटी बोरियों की आड़ में सिर्फ ‘साहब लोगों’ की तिजोरियां भरी जा रही हैं? यदि समय रहते इस खेल की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कड़ा चाबुक नहीं चलाया गया, तो आने वाले दिनों में सरयू की लहरें सिर्फ गांव नहीं, बल्कि सिस्टम के खोखलेरपन को भी बहा ले जाएंगी।
— बस्ती ब्यूरो
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