बस्ती के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में हुए लगभग नौ करोड़ रुपये के घोटाले की विजिलेंस जांच के दौरान साक्ष्य मिटाने और पत्रावलियाँ गायब करने का गंभीर आरोप.

अजीत मिश्रा (खोजी)
विजिलेंस जांच से बचने के लिए सीएमओ कार्यालय से संबंधित फाइलों को गायब कर उन्हें आग में जलने का बहाना बनाने की आशंका जताई गई है।
- वर्तमान सीएमओ डॉ. राजीव निगम पर तत्कालीन सीएमओ डॉ. आर.एस. दुबे और पटल सहायक प्रेम बहादुर सिंह के वित्तीय कदाचार को बचाने तथा फाइलें छिपाने में संलिप्त होने का आरोप लगाया गया है।
- 50 लाख रुपये का स्टेशनरी घोटाला, 300 कर्मियों की फर्जी नियुक्ति और जेम पोर्टल पर बिना टेंडर के करोड़ों का फर्नीचर खरीदने जैसे गंभीर मामले शामिल हैं।
बस्ती यूपी।। बस्ती के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) कार्यालय में हुए लगभग नौ करोड़ रुपये के बहुचर्चित घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, महकमे के भीतर मलाई काटने वालों के होश उड़े हुए हैं। हालात यह हैं कि विजिलेंस जांच की आंच से बचने के लिए अब साक्ष्यों को ही खुर्द-बुर्द करने और सरकारी पत्रावलियों को गायब करने का घृणित खेल खेला जा रहा है।
यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि कानून की आंखों में धूल झोंककर सबूतों को मिटाने की एक सुनियोजित साजिश का है। एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह द्वारा सतर्कता अधिष्ठान (गोरखपुर सेक्टर) के पुलिस अधीक्षक को दिए गए प्रार्थना पत्र ने इस पूरे भ्रष्ट तंत्र की कलई खोलकर रख दी है। घोटाले की फेरिस्त इतनी लंबी और गहरी है कि व्यवस्था की साख पर बड़े सवाल खड़े होते हैं—50 लाख रुपये का स्टेशनरी घोटाला, 300 कर्मियों की फर्जी नियुक्तियां, और जेम पोर्टल की धज्जियां उड़ाते हुए बिना टेंडर के करोड़ों की फर्नीचर खरीद जैसे गंभीर आरोप इसमें शामिल हैं।
सवाल यह उठता है कि जब मामले की विजिलेंस जांच चल रही है, तो सीएमओ कार्यालय से जुड़ी संवेदनशील फाइलें और पत्रावलियाँ अचानक गायब कैसे हो गईं? आशंका इस बात की सबसे ज्यादा गहरी है कि इन दस्तावेजों को सुरक्षित छुपाने या नष्ट करने के बाद यह कुतर्क गढ़ने की तैयारी है कि फाइलें आग में जलकर खाक हो गईं। क्या स्वास्थ्य विभाग के ये जिम्मेदार अधिकारी कानून और शासन व्यवस्था से भी ऊपर हो चुके हैं?
इस पूरे भ्रष्टाचार के केंद्र में तत्कालीन सीएमओ डॉ. आर.एस. दुबे और उनके पटल सहायक प्रेम बहादुर सिंह के साथ-साथ वर्तमान सीएमओ डॉ. राजीव निगम की संदिग्ध भूमिका भी सामने आ रही है। आरोप सीधा है कि वर्तमान सीएमओ न केवल विजिलेंस टीम को पत्रावलियां मुहैया कराने से कतरा रहे हैं, बल्कि अपने पूर्ववर्तियों के वित्तीय कदाचार पर पर्दा डालने और फाइलों को गायब कराने के इस खेल में मददगार बने हुए हैं।
अब प्रशासन और पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को लीपापोती की नीति छोड़नी होगी। पुलिस अधीक्षक, सतर्कता को बिना किसी विलंब के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पत्रावलियाँ गायब करने वाले और घोटाले में लिفت तमाम चेहरों पर एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। कार्यालय में आगजनी जैसी किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए तत्काल सुरक्षा कड़ी की जानी चाहिए और सभी संबंधित अभिलेखों को सुरक्षित कब्जे में लिया जाना चाहिए। यदि समय रहते इन साक्ष्यों को संरक्षित नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब भ्रष्टाचार के सबूतों को छिपाने के लिए फाइलों वाली अलमारियों को ही रहस्यमयी आग के हवाले कर दिया जाएगा। बस्ती की जनता अब खामोश नहीं बैठेगी, उसे फाइलों को गायब करने वालों की गिरफ्तारी और इस महाघोटाले के पर्दाफाश का इंतज़ार है।
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