बस्ती: डीएफओ की ढुलमुल नीति से बेलगाम हुए वन कर्मचारी, अवैध कटान का विरोध करने पर जनता को दी गालियां

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में वन विभाग बेलगाम: हरे पेड़ों की अवैध कटान और विरोध पर जनता को “गालियों की सौगात”
- बनकटी के देईसाँड़ में हरे पेड़ों की अवैध कटान: कार्रवाई की जगह शिकायतकर्ता पर बरसीं वन कर्मियों की गालियां
- क्या बस्ती डीएफओ के संरक्षण में पनप रहे हैं गालीबाज वन कर्मी? देईसाँड़ की घटना ने खोली महकमे की पोल
- कानून के रखवाले या अभद्रता के पर्याय? बस्ती में वन विभाग की लचर कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
बस्ती, उत्तर प्रदेश
- डीएफओ की ढुलमुल कार्यशैली के चलते बेलगाम हुए वन कर्मचारी।
- बनकटी विकास खंड के देईसाँड़ गाँव में अवैध कटान की सूचना पर पहुँची टीम का शर्मनाक कारनामा।
- नियम-संगत कार्रवाई के बजाय शिकायतकर्ता और आम जनता पर सरेआम गालियों की बौछार।
- लोकतंत्र में जनता की आवाज दबाने और अभद्रता करने वाले कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग।
बस्ती जनपद में वन विभाग के कर्मचारियों के हौسले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि अब वे कानून के रखवाले कम और किसी अराजक तत्व की तरह ज्यादा नजर आने लगे हैं। वन महकमे की भ्रष्टाचार और लूटखसोट वाली नीतियों के कारण जिले में प्रतिदिन हजारों हरे-भरे पेड़ धराशायी हो रहे हैं, लेकिन हद तो तब पार हो गई जब कटान की सूचना पर पहुँचे वन कर्मचारियों ने कर्तव्यनिष्ठा दिखाने के बजाय शिकायतकर्ता और आम जनता को ही गालियों से नवाजना शुरू कर दिया।
ताजा मामला बनकटी विकास खंड के देईसाँड़ का है। यहाँ बिना किसी अनुमति के धड़ल्ले से हरे पेड़ों की कटान की जा रही थी। जब स्थानीय जागरूक नागरिकों ने इस अवैध कृत्य की सूचना वन विभाग को दी, तो मौके पर पहुँची टीम को निष्पक्ष जाँच और नियम-संगत कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन इसके विपरीत, विभाग के नुमाइंदों ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए शिकायतकर्ता और वहाँ मौजूद आम जनता पर गालियों की बौछार कर दी।
संविधान के दायरे में रहकर कानून की रक्षा करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन क्या वन विभाग के कर्मचारियों ने कानून को अपनी जेब में रख लिया है? क्या जनता को सच्चाई बताने के बदले अपशब्द सुनना ही उनका इनाम है?
इस प्रकार की घटनाएं समाज में गंभीर चर्चा और चिंता का विषय बनी हुई हैं। सूत्रों की मानें तो इन बेलगाम कर्मचारियों के हौसले इतने ऊंचे होने के पीछे जनपद की वन विभाग की मुखिया यानी डीएफओ (DFO) की ढुलमुल और लचर नीतियां जिम्मेदार हैं। यदि समय रहते विभाग द्वारा ऐसे अनुशासनहीन कर्मचारियों पर नकेल कसी जाती, तो देईसाँड़ जैसी निर्लज्ज घटना शायद कभी न घटती।
लोकतंत्र में जनता के साथ गाली-गलौज और अभद्रता किसी भी कीमत पर क्षम्य नहीं है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या बस्ती की डीएफओ इस मामले में कोई प्रभावी और नज़ीर पेश करने वाली कार्रवाई करती हैं, या फिर हमेशा की तरह यह गंभीर मामला भी कागजों की धूल में दफन होकर “ढाक के तीन पात” साबित होगा। जनता और बुद्धिजीवियों की निगाहें अब महकमे के रुख पर टिकी हैं।
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