सरकारी जमीनों पर रसूखदारों का कब्जा या प्रशासनिक मिलीभगत?

बिधूना तहसील क्षेत्र में अमृत सरोवर के पास चारागाह की भूमि पर धान की खेती का खेल;
लेखपाल की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
व्यूरो चीफ औरैया: रंजीत शर्मा
उत्तर प्रदेश शासन की ओर से भले ही सरकारी संपत्तियों, बंजर व चारागाह की जमीनों को भू-माफियाओं और अवैध कब्जों से मुक्त कराने के लिए 'जीरो टालरेंस' की नीति पर सख्ती से काम करने के दावे किए जा रहे हों, लेकिन मैदानी स्तर पर जिम्मेदार राजस्व कर्मियों की कार्यशैली इन दावों की पोल खोल रही है। जनपद के बिधूना तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत गूरा में अमृत सरोवर के ठीक पास स्थित सरकारी चारागाह की भूमि पर धान की लहलहाती फसल उगाए जाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय लेखपाल की भूमिका और कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अभिलेखों में चारागाह, धरातल पर निजी खेती का खेल:
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम गूरा में स्थित उक्त भूमि राजस्व अभिलेखों में स्पष्ट रूप से 'चारागाह' के रूप में दर्ज है। नियमानुसार चारागाह या ग्राम समाज की सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत कब्जे, फसल बोआई या वाणिज्यिक उपयोग का कोई प्रावधान नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि अमृत सरोवर के समीप स्थित इस बेशकीमती सरकारी जमीन पर सुनियोजित तरीके से धान की फसल बो दी गई। जब इस अवैध कब्जे और फसल की जानकारी स्थानीय ग्रामीणों ने हल्का लेखपाल रिजवान से की, तो उनका यह कहना कि उन्हें मामले की कोई जानकारी ही नहीं है, अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।
एक तरफ राजस्व अभिलेखों के रखवाले लेखपाल को अपने ही क्षेत्र की सरकारी भूमि पर हो रही खेती की भनक तक नहीं होती, तो वहीं दूसरी तरफ बिना विभागीय अनुमति के वहां फसल लहलहा जाना प्रशासनिक सुस्ती या फिर गहरी मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
हास्यास्पद तर्क और अनुमति पर पर्दा:
मामला मीडिया और उच्च अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद लेखपाल द्वारा यह अजीबोगरीब तर्क दिया गया कि इस भूमि पर पूर्व में दो बार पौधरोपण कराया गया था, लेकिन भूमि बंजर होने के कारण पौधे जीवित नहीं बचे। इसके बाद भूमि को उपजाऊ बनाने के उद्देश्य से वहां धान की बोआई करा दी गई।
यहाँ सबसे बड़ा विधिक और प्रशासनिक सवाल यह उठता है कि क्या किसी सरकारी बंजर या चारागाह की भूमि को 'उपजाऊ' बनाने के नाम पर उस पर निजी या प्रशासनिक स्तर से खेती करने का कोई कानूनी प्रावधान है? यदि ऐसा किया भी गया, तो क्या इसके लिए जिलाधिकारी या किसी सक्षम प्राधिकारी से कोई वैधानिक अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति नहीं ली गई थी, तो सार्वजनिक संपत्ति का इस तरह उपयोग किसके इशारे पर किया जा रहा था? और सबसे अहम बात—जब लेखपाल को फसल बोए जाने की जानकारी ही नहीं थी, तो कल को फसल तैयार होने के बाद उसके रखरखाव, कटाई और उसकी उपज के सरकारी खजाने (राजस्व) में जमा होने की पारदर्शिता पर कौन पहरा देता?
ग्रामीणों का रोष और उपजिलाधिकारी के सख्त जांच के आदेश:
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि सरकारी जमीन पर फसल बोने का यह पूरा षड्यंत्र किसी बड़े निहित स्वार्थ को साधने के लिए रचा गया है, जिसकी उच्चस्तरीय जांच बेहद आवश्यक है। मामला तूल पकड़ने के बाद उपजिलाधिकारी बिधूना कमल कुमार सिंह ने इस पूरे प्रकरण को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए तत्काल जांच के आदेश दे दिए हैं।
एसडीएम के निर्देश के बाद अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि चारागाह की भूमि पर यह धान की खेती किसके मौखिक या लिखित निर्देश पर कराई गई, इसके पीछे किसकी संलिप्तता है और फसल की उपज का बंदरबांट किसकी शह पर होना था। 'न्याय पथ' जनहित और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर पैनी नजर रखेगा, ताकि सार्वजनिक जमीनों पर सेंध लगाने वालों को बेनकाब किया जा सके।
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