हिंदू धर्म में पितृपक्ष का समापन सर्व पितृमोक्ष अमावस्या के दिन होता है

हिंदू धर्मावलंबियों के लिए पितृपक्ष का समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है, इस दौरान लोग अपने पितरों का सम्मान करते हुए, श्रद्धापूर्वक दान, पिंडदान, तर्पण, आदि किया करतें हैं। पितृपक्ष का यह पखवाड़ा सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तिथि को दिन होता है,।
सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तिथि को पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, आदि कर्मों के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है।पंचांग के अनुसार इस वर्ष अश्विन मास सर्व पितृमोक्ष अमावस्या 10 अक्टूबर दिन शनिवार को पड़ रही है।.हिंद धार्मिक मान्यतानुसार जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि मालूम नहीं होती है,अथवा किसी कारणवश पितृपक्ष के दिनों में पितरों का श्राद्धकर्म नहीं हो पाता है, उनके लिए सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तिथि के दिन श्राद्धकर्म, तर्पण आदि किया जा सकता है। सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तिथि पर श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, दान पुण्य, दीपदान आदि करना बहुत ही शुभ अच्छा माना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पर पितरों का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक पूरे विधि-विधान से पितरों के हित में पूजा करने से पितरों का शुभ आशिर्वाद प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि अश्विन मास सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पर सभी पितृगण की वापसी उनके गंतव्य की ओर होने लगती हैं ,इस दिन संध्याकाल के समय पितृगण सूर्य और चंद्रमा की रश्मियों के सहारे से अपने पितृलोक क वापस चले जातें हैं, इसलिए इस दिन संध्याकाल में पितरों के वंशजों द्वारा प्रज्वलित किए गए दीपों की रोशनी से पितरों को पितृलोक वापसी का मार्ग दिखाई देता है, और पितृगण आशिर्वाद स्वरूप इस धरती पर रह रहे अपने परिजनों के घर परिवार के लिए सुख शांति प्रदान करतें हैं।
सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पर संध्याकाल के समय में पितरों को भोग लगाकर अपने घर के मुख्य द्वार पर दीपक प्रज्वलित करके प्रार्थना करनी चाहिए श्रद्धापूर्वक तर्पित हुए पितृगण हमें दीर्घायु, संतान, आर्थिक समृद्धि, उत्तम विद्या की प्राप्ति, सुख शांति का आशिर्वाद प्रदान करतें हैं। सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पर मध्यान्ह काल को समय में स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने सभी पितृगणों के निमित्त श्रद्धापूर्वक श्राद्ध, तर्पण, करना चाहिए, और सभी पितरों के हित के लिए इस दिन ब्राम्हण भोजन कराने की भी विधान है, ऐसा माना जाता है कि पितृ विसर्जन के समय, पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, आदि पितरों के लिए तर्पण करने का विधान है।
सर्व पितृमोक्ष अमावस्या पर अपने पितृवंश,मातृवंश, गुरूवंश, श्वसूर वंश, आदि पितरों का भी श्राद्धकर्म किया जा सकता है। हिंदू धर्म शास्त्र अनुसार "पितरों प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्व देवता", इसका अर्थ है कि पितरों के प्रसन्न रहने पर सभी देवी देवता भी प्रसन्न रहतें हैं,और तभी जाकर मनुष्यों के सभी जप तप पूजा-पाठ, अनुष्ठान, पुण्य कर्म साधना आदि सफल भी होतें हैं।
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