‘स्वास्थ्य व्यवस्था’ या ‘कमिशन का अड्डा’: सरकारी अस्पतालों से करोड़ों की दवाएं गायब, मरीज दर-दर भटकने को मजबूर!

अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य व्यवस्था का ‘वेंटिलेटर’ पर होना: दवाओं की चोरी या गरीबों के हक पर डाका?
- कागजों में खरीद, धरातल पर सन्नाटा: क्या सफेदपोशों की शह पर चल रहा है दवाओं की चोरी का खेल?
- PHC-CHC पर ‘वेंटिलेटर’ पर स्वास्थ्य सेवाएं: मरीज खरीद रहे बाहर से दवाएं, अफसर मस्त-जनता त्रस्त!
- गरीबों के हक की दवाओं पर डाका: बीपी-शुगर के मरीज परेशान, रीजेंट और सीरिंज तक गायब!
- बजट के बावजूद दवाएं नदारद: आखिर किसकी जेब भर रहा है सरकारी स्वास्थ्य का बजट?
बस्ती जिले के प्राथमिक (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) से जीवन रक्षक दवाओं, सीरिंज और शुगर-बीपी की दवाओं का गायब होना केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गरीब मरीजों की जिंदगी के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है।
सरकार हर साल स्वास्थ्य सुविधाओं और दवाओं की खरीद के लिए करोड़ों रुपयों का बजट आवंटित करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अस्पतालों में सूई तक के लिए डॉक्टर और मरीज तरस रहे हैं।
1. कागजों में खरीद, हकीकत में सन्नाटा
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई महीनों से पीएचसी और सीएचसी में बीपी और शुगर की दवाएं गायब हैं, जबकि अस्पतालों में आने वाले 50 प्रतिशत से अधिक मरीज इन्हीं बीमारियों के होते हैं। हद तो यह है कि खून जांचने के लिए रीजेंट (Reagent) तक उपलब्ध नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि जब सरकार बजट दे रही है, तो दवाएं और उपकरण आखिर जा कहाँ रहे हैं? क्या यह दवाओं की सीधी ‘चोरी’ है या कमिशनखोरी का घिनौना खेल?
2. कमिशन का खेल और मजबूरी का फायदा
अस्पतालों में दवाएं न होने का खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ता है। मरीजों को 50 प्रतिशत कमिशन वाली महंगी दवाएं और मेडिकल स्टोर से सीरिंज-सुई बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। क्या यह जानबूझकर बनाया गया एक ऐसा तंत्र है, जिससे बाहरी मेडिकल स्टोरों और कमिशनखोरों की जेबें भर सकें?
3. बैठकों का ढोंग और अधिकारियों की चुप्पी
जिला स्वास्थ्य समिति (DISHA) की बैठकों में अधिकारी केवल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेते हैं। जब पीएचसी और सीएचसी के अधीक्षक दवाओं की कमी का मुद्दा उठाते हैं, तो समाधान निकालने के बजाय उन्हें ही निशाने पर ले लिया जाता है। होम्योपैथिक अस्पतालों में दो साल से दवाएं नहीं हैं, जबकि बजट उपलब्ध है। क्या जिला प्रशासन (DM, CDO, CMO) का काम सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर करना है?
4. औचक निरीक्षण से परहेज क्यों?
मंडलीय औषधि भंडार और स्टोरों में क्या चल रहा है, इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। अगर उच्च अधिकारी स्वयं धरातल पर जाकर अस्पतालों और स्टोरों का औचक निरीक्षण करें, तो इस ‘खेल’ का पर्दाफाश होने में देर नहीं लगेगी। लेकिन ऐसा न होना कई सवाल खड़े करता है।
निष्कर्ष और मांग
स्वास्थ्य सेवाएं हर नागरिक का मौलिक अधिकार हैं। बस्ती जिले में स्वास्थ्य विभाग की इस बदहाली पर शासन और प्रशासन को तुरंत कड़ा संज्ञान लेना चाहिए:
- पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
- सीएमएसडी (CMSD) और मंडलीय औषधि भंडार के स्टॉक का ऑडिट किया जाए।
- दोषी अधिकारियों और कमिशनखोरी के इस सिंडिकेट पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
अगर समय रहते इन ‘सफेदपोश चोरों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो सरकारी अस्पतालों से जनता का बचा-खुचा विश्वास भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
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