सिद्धार्थनगर के बाद बस्ती में भी खुली पोल: आबकारी विभाग की शह पर चल रहा मिलावटी और ओवर-रेटिंग का अवैध खेल!

अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और आबकारी की मिलीभगत या निकम्मापन? सिद्धार्थनगर के बाद अब बस्ती में भी शराब माफियाओं के आगे नतमस्तक हुआ विभाग!
- शराब के ठेकों पर मिलावट का जहर और ओवर-रेटिंग का नंगा नाच; आखिर कब जागेगा बस्ती का आबकारी विभाग?
- मुंडेरवा में पानी मिली शराब पकड़े जाने के बाद भी बेअसर आबकारी महकमा—क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
- ‘खाकी’ ने पकड़ी मिलावटी शराब, पर आबकारी विभाग की चुप्पी पर उठ रहे बड़े सवाल!
- नियम-कानून ताक पर, ओवर-रेटिंग और मारपीट आम: बस्ती में बेलगाम हुए शराब माफियाओं को किसका संरक्षण?
बस्ती: पड़ोसी जिले सिद्धार्थनगर में मिश्रित अंग्रेजी शराब (नकली व मिलावटी शराब) का काला कारोबार बेनकाब होने के बाद भी बस्ती जनपद का आबकारी विभाग अपनी गहरी नींद से जागने को तैयार नहीं है। स्थिति यह है कि जिले में आबकारी महकमे की कथित शह पर नियम-कानूनों की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। मुंडेरवा थानाक्षेत्र में कंपोजिट शराब की दुकान पर पुलिस और आबकारी की संयुक्त छापेमारी में ब्रांडेड अंग्रेजी शराब में पानी मिलाने (मिलावट) का जो सनसनीखेज मामला सामने आया है, उसने विभाग की कार्यशैली और ईमानदारी पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
विभागीय शह पर बेखौफ चल रहा अवैध कारोबार
सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारियां बेहद चौंकाने वाली हैं। जिलेभर में लाइसेंसी दुकानों पर मनमानी का बोलबाला है:
- समय से पहले और रातभर बिक्री: आबकारी नियमों को ताक पर रखकर दुकानें तय समय से पहले खोली जा रही हैं और आधी रात तक धड़ल्ले से शराब की बिक्री हो रही है।
- ओवर रेटिंग का नंगा नाच: ग्राहकों से तय मूल्य से अधिक दाम वसूले जाने की शिकायतें आम हैं। हैरानी की बात यह है कि यह ओवर रेटिंग पूरी तरह से विभागीय मिलीभगत और संरक्षण में फल-फूल रही है।
- खून-खराबे का अंदेशा: मनमाने दामों पर शराब बेचने और फर्जीवाड़े के विरोध पर आए दिन आम जनता और खरीदारों के साथ मारपीट की घटनाएं आम हो चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे हैं।
छापेमारी में खुली पोल, पर जिम्मेदारों पर कब होगी कार्रवाई?
बीती 29 अक्टूबर को मुंडेरवा थानाध्यक्ष विश्वमोहन राय और आबकारी निरीक्षक सुनील कुमार द्वारा की गई संयुक्त छापेमारी ने इस काले खेल की पोल खोल दी। ‘8 पीएम’, ‘रॉयल स्टैग’, ‘आइकॉनिक’ और ‘आफ्टर डार्क’ जैसे नामचीन ब्रांडों के अद्धों और पौवों में पानी मिलाकर ग्राहकों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा था। मौके से दो आरोपियों की गिरफ्तारी और 30,020 रुपये नकद बरामदगी इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह रैकेट कितना संगठित है।
सवाल यह उठता है कि जब इस तरह के गंभीर मामले सामने आ रहे हैं, तब भी जिला आबकारी अधिकारी और उनका अमला प्रभावी कार्रवाई करने में क्यों बेअसर साबित हो रहा है? क्या आबकारी विभाग किसी बड़े हादसे या जनआक्रोश का इंतजार कर रहा है?
यदि समय रहते बस्ती प्रशासन और उच्चाधिकारियों ने इस गिरोह और इसके संरक्षकों पर सख्त शिकंजा नहीं कसा, तो जनता का कानून और व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। अब देखना यह है कि क्या शासन स्तर से इस सुस्त और संलिप्त आबकारी तंत्र पर कोई गाज गिरती है या फिर फाइलों में ही कार्रवाई दबा दी जाएगी।
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