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बस्ती के ‘स्टार हॉस्पिटल’ पर गंभीर सवाल: बोर्ड पर डॉक्टरों की लंबी फेहरिस्त, पर कागजों में गायब मिले पंजीकरण!

06 Nov 2026, 01:00 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

​स्वास्थ्य व्यवस्था या छलावा? बस्ती के ‘स्टार हॉस्पिटल’ पर बोर्ड की लंबी फेहरिस्त और कागजी सन्नाटे का गंभीर खेल!

  1. स्वास्थ्य व्यवस्था से खिलवाड़ या छलावा? स्टार हॉस्पिटल में बिना वैध पंजीकरण के महिला रोग विशेषज्ञ के संचालन का आरोप!
  2. ​कागज पर बड़े विशेषज्ञ, हकीकत में सन्नाटा: बस्ती के पचपेडिया मार्ग स्थित निजी अस्पताल की कार्यशैली पर उठे सवाल!
  3. ​बोर्ड पर चमकते नाम और अंदर मरीजों की जिंदगी से सौदा? बस्ती स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर खड़े हुए बड़े प्रश्न!

​बस्ती: जिले में निजी अस्पतालों के मुनाफे का कारोबार किस हद तक मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहा है, इसकी बानगी पचपेडिया मार्ग पर स्थित ‘स्टार हॉस्पिटल’ के बाहर टंगे उस बड़े बोर्ड को देखकर साफ समझी जाती है, जिस पर देश-विदेश और राजधानी के बड़े-बड़े नामी डॉक्टरों की लंबी फेहरिस्त चस्पा है। आलीशान बोर्ड और उस पर लिखी भारी-भरकम डिग्रियां देखकर कोई भी आम मरीज यही सोचेगा कि उसे महानगरों जैसा इलाज इसी छत के नीचे मिल जाएगा। लेकिन, जब इन बोर्डों के पीछे की हकीकत को टटोला गया, तो स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली और अस्पताल के दावों की कलई उतरते देर नहीं लगी।

​कागजों पर ‘विशेषज्ञ’, हकीकत में बड़े सवाल!

​अस्पताल के परिचय बोर्ड पर मरीजों को रिझाने के लिए जिन दिग्गज चिकित्सकों के नाम और उपाधियां चमक रही हैं, उनमें डॉ. अजीम खान (फिजिशियन), डॉ. सुशांत कुमार यादव (सर्जन), डॉ. कीर्ति सिंह, जैद अहमद खान (यूरो एवं किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन), डॉ. प्रथमेश मिश्रा (न्यूरो सर्जन), डॉ. विभोर महेंद्रु (कैंसर रोग विशेषज्ञ) से लेकर डॉ. चंद्रमौली मिश्रा (गैस्ट्रो, नई दिल्ली) तक शामिल हैं।

​सवाल यह है कि क्या ये तमाम नाम वाकई इस अस्पताल की नियमित व्यवस्था का हिस्सा हैं या फिर मरीजों को आकर्षित करने भर का एक ‘साइनबोर्ड स्टंट’ हैं? क्या इन डॉक्टरों को इस बात की भनक है कि उनके नाम का इस्तेमाल किस प्रकार किया जा रहा है?

​सबसे बड़ा सवाल: डॉ. कनीज फातिमा के मामले में क्या छिपा रहा है अस्पताल?

​इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू डॉ. कनीज फातिमा से जुड़ा है। अस्पताल के परिचय में उन्हें स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में दर्शाया गया है और आरोप है कि वह अस्पताल में भर्ती प्रसूताओं व महिला मरीजों के उपचार एवं निगरानी में सक्रिय रूप से दिखती भी हैं।

​जब इस बाबत मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय और यूनानी विभाग से पड़ताल की गई, तो जो जानकारी सामने आई, वह होश उड़ाने वाली थी। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, स्टार हॉस्पिटल में डॉ. कनीज फातिमा का स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कोई वैध पंजीकरण दर्ज नहीं है। जब विभाग के पास ही इसका कोई आधिकारिक पुख्ता प्रमाण नहीं है, तो आखिर किस नैतिकता और अधिकार के तहत उन्हें स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में मरीजों के जीवन से खेलने की खुली छूट दी गई?

​बोर्ड के भरोसे मरीज, या डॉक्टरों की असल तैनाती?

​अस्पताल की चौखट पर दर्द लेकर पहुंचने वाला गरीब और लाचार मरीज यह नहीं जानता कि जिस डॉक्टर के नाम पर वह अपना खून-पसीना बहाकर पैसे खर्च कर रहा है, उसकी ज़मीनी हकीकत क्या है। मरीज बोर्ड पर लिखी डिग्रियां पढ़कर अस्पताल में दाखिल होता है, लेकिन अंदर पर्दे के पीछे का सच कुछ और ही निकलता है। यदि बिना वैध पंजीकरण या बिना पुख्ता संबद्धता के इस तरह डॉक्टरों के नाम का इस्तेमाल कर मरीजों का इलाज किया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के साथ आपराधिक खिलवाड़ है।

​स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

​यह कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि बस्ती में ऐसे कई कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी अस्पताल मानकों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। अब गेंद मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के पाले में है।

​जनता और मीडिया की मांग है कि इस मामले में तत्काल प्रभाव से निम्नलिखित कदम उठाए जाएं:

  1. ​अस्पताल के पंजीकरण, चिकित्सकों की सूची, मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन, नियुक्ति पत्रों और संबद्धता के दस्तावेजों की कागजी जांच हो।
  2. ​यह सुनिश्चित किया जाए कि ओपीडी और भर्ती मरीजों के इलाज के समय वास्तव में कौन डॉक्टर ड्यूटी पर मौजूद रहता है।
  3. ​डॉ. कनीज फातिमा के मामले और अन्य प्रदर्शित डॉक्टरों की वास्तविक स्थिति का भौतिक सत्यापन कर सार्वजनिक किया जाए।

​यदि जांच में यह साबित होता है कि भ्रामक प्रचार, फर्जी बोर्ड या अपात्र व्यक्तियों द्वारा मरीजों का इलाज किया जा रहा है, तो सिर्फ नोटिस का खेल नहीं, बल्कि अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करते हुए जिम्मेदारों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

​सवाल साफ है—क्या बस्ती का स्वास्थ्य विभाग कागजों के इस खेल पर नकेल कसेगा, या फिर यूं ही मरीजों की जिंदगियों से सौदा होता रहेगा?

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