दो साल में ही उखड़ी भैरवगंज-गौर ब्लॉक मार्ग की सड़क, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा करोड़ों का बजट

अजीत मिश्रा +खोजी)
विकास के दावों की खुली पोल: दो साल के भीतर गड्ढों में तब्दील हुआ तेनुआ-भैरवगंज मार्ग
- कागजों में पास, धरातल पर बर्बाद: PWD और ठेकेदार की सांठगांठ से जर्जर हुई सड़क
- सरकारी धन का दुरुपयोग: दो साल में ही उखड़ी आरसीसी और डामर की परत, उठ रहे बड़े सवाल
- बस्ती में भ्रष्टाचार की सड़क: कागजी कोरम पूरा करने वालों पर कब होगी कार्रवाई?
गौर – बस्ती।। विकास के नाम पर कागजों में बनने वाली सड़कें और हकीकत में कुछ ही महीनों में गड्ढों में तब्दील होती पटरियाँ—यह हमारे सिस्टम की उस नासूर बन चुकी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है, जहाँ जनता के पसीने की कमाई भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। बस्ती जिले का भैरवगंज–गौर ब्लॉक मार्ग (तेनुआ मंदिर और मुड़िलवा होते हुए) इसका ताजा और शर्मनाक उदाहरण है। जिस सड़क को क्षेत्रवासियों के जीवन को सुगम बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किया गया था, वह महज दो साल के भीतर ही अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
दो साल पहले जिस सड़क पर आरसीसी और डामर की मजबूत परतें बिछाई गई थीं, आज वहाँ केवल उखड़ी हुई गिट्टियाँ, जानलेवा गड्ढे और बेपटरी हो चुका बुनियादी ढांचा बचा है। सड़क के किनारे नालियों का अधूरा निर्माण इस बात का खुला गवाह है कि इस परियोजना में किस हद तक लापरवाही और खानापूर्ति की गई है। क्या कायदे से बनी कोई सड़क महज चौबीस महीनों में इतनी जर्जर हो सकती है? यह सवाल किसी आम नागरिक के मन में नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उस ठेकेदार की नीयत और पीडब्ल्यूडी (PWD) के उन जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रहार है, जिनकी निगरानी में यह पूरा खेल रचा गया।
सरकारी खजाने से निकलने वाला एक-एक रुपया आम जनता के कर (Tax) का होता है, जिसे विकास के नाम पर पानी की तरह बहाया जाता है। लेकिन जब ठेकेदार और भ्रष्ट नुमाइंदों की सांठगांठ से मानक ताक पर रख दिए जाते हैं, तो विकास महज कागजों तक सिमट कर रह जाता है। इस सड़क की मौजूदा हालत चीख-चीख कर कह रही है कि निर्माण के दौरान न तो सही सामग्री का इस्तेमाल हुआ और न ही बेस या मोटाई के मानकों की सुध ली गई। कागजों में माप पुस्तिका (Measurement Book) दुरुस्त कर ली गई होगी, फाइलें पास हो गई होंगी और भुगतान भी झटपट हो गया होगा, लेकिन धरातल पर जनता को मिला सिर्फ छल।
अब वक्त आ गया है कि इस लापरवाही को महज एक संयोग मानकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि इसकी सघन तकनीकी और वित्तीय जांच हो। सड़क के निर्माण से जुड़े अभिलेखों, मैटेरियल टेस्ट रिपोर्ट और भुगतानों की परतें उधेड़नी होंगी। यदि जांच में घटिया निर्माण की पुष्टि होती है, तो केवल ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने से काम नहीं चलेगा; उन तमाम लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए जिनकी शह पर यह भ्रष्टाचार फला-फूला। बस्ती की जनता अब खोखले आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है—उन्हें सड़क चाहिए, गड्ढे नहीं, और इन गड्ढों को जन्म देने वाले जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई का इंतजार है।
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