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6 महीने की उम्र में हादसे ने छीन लिया पैर, फिर भी नहीं टूटा हौसला; एक टांग पर 400 मीटर दूर स्कूल जाती है बलिया की 7 साल की रागिनी

05 Sep 2026, 10:48 PM • Vande Bharat Live TV News
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6 महीने की उम्र में हादसे ने छीन लिया पैर, फिर भी नहीं टूटा हौसला; एक टांग पर 400 मीटर दूर स्कूल जाती है बलिया की 7 साल की रागिनी - BALLIA, उत्तर प्रदेश

दूसरे बच्चों को स्कूल जाते देख पढ़ने की जिद करती थी मासूम रागिनी; आर्थिक तंगी के बीच परिवार ने मांगा कृत्रिम पैर और ट्राईसाइकिल, प्रशासन ने मदद का दिया भरोसा

बलिया, उत्तर प्रदेश।
कुछ कहानियां केवल खबर नहीं होतीं, बल्कि जिंदगी से हार मान चुके लोगों के लिए हिम्मत का संदेश बन जाती हैं। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की महज 7 साल की रागिनी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते हुए स्कूल जाते हैं, उस उम्र में रागिनी एक टांग के सहारे करीब 400 मीटर का कठिन रास्ता तय करके पढ़ने स्कूल पहुंचती है।

रागिनी के पास एक पैर नहीं है, लेकिन उसके सपनों की उड़ान किसी भी तरह अधूरी नहीं है। उसका स्कूल जाने का जुनून और पढ़ाई के प्रति लगन आज हर किसी को भावुक कर रही है।

महज 6 महीने की उम्र में हुआ था दर्दनाक हादसा

मामला बलिया जिले के मनियर ब्लॉक की दिघेड़ा ग्राम सभा के रानीपुर गांव का बताया जा रहा है। रागिनी की मां बबीता देवी के अनुसार, जब रागिनी महज छह महीने की थी, तब वह उसे गोद में लेकर दवा लेने जा रही थीं। इसी दौरान रास्ते में सड़क हादसा हो गया।

हादसे में रागिनी का एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया। परिवार ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार कई जगह उसका इलाज कराया, लेकिन पैर की स्थिति में सुधार नहीं हो सका।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के सामने महंगे इलाज की व्यवस्था करना भी बड़ी चुनौती बन गया। परिस्थितियां कठिन थीं, लेकिन रागिनी ने जिंदगी के सामने हार नहीं मानी।

दूसरे बच्चों को स्कूल जाते देख रोती थी रागिनी

जैसे-जैसे रागिनी बड़ी हुई, उसने अपने आसपास के बच्चों को बस्ता लेकर स्कूल जाते देखा। दूसरे बच्चों को पढ़ने जाते देखकर उसका भी मन स्कूल जाने के लिए मचल उठता था।

परिजनों के मुताबिक, वह बार-बार स्कूल जाने की जिद करती और रोते हुए कहती थी कि उसे भी पढ़ना है।

आखिरकार रागिनी का दाखिला प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में कक्षा-1 में कराया गया।

एक टांग पर तय करती है 400 मीटर का रास्ता

रागिनी का स्कूल उसके घर से करीब 400 मीटर दूर है। सामान्य बच्चे के लिए यह दूरी मामूली लग सकती है, लेकिन रागिनी के लिए यही 400 मीटर रोज एक कठिन परीक्षा बन जाते हैं।

कभी परिवार का कोई सदस्य उसे स्कूल तक छोड़ देता है और कभी रागिनी अपना बस्ता उठाकर स्वयं ही एक पैर पर कूदते हुए स्कूल की ओर निकल पड़ती है।

कच्चे और असमान रास्ते पर हर कदम उसके लिए संघर्ष है। कई बार थकान इतनी बढ़ जाती है कि वह रास्ते में बैठ जाती है। लेकिन कुछ देर बाद फिर उठती है और स्कूल की तरफ बढ़ जाती है।

उसके लिए मंजिल केवल स्कूल की इमारत नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बदलने का सपना है।

दर्द बड़ा है, लेकिन पढ़ने का हौसला उससे भी बड़ा

रागिनी की जिंदगी में जो हादसा आया, उसने उसके शरीर से एक पैर जरूर छीन लिया, लेकिन उसकी हिम्मत, इच्छाशक्ति और पढ़ने का सपना नहीं छीन पाया।

इतनी छोटी उम्र में जिस साहस के साथ वह रोज अपनी परेशानियों का सामना कर रही है, वह समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।

रागिनी की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोग उसके हौसले की सराहना कर रहे हैं।

परिवार ने मांगा कृत्रिम पैर और ट्राईसाइकिल

रागिनी के परिवार और विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने उसके भविष्य को देखते हुए प्रशासन से कृत्रिम पैर और ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि उसे रोज स्कूल आने-जाने में इतनी कठिनाई का सामना न करना पड़े।

मामला प्रशासन के संज्ञान में आने के बाद बलिया के जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह द्वारा दिव्यांग विभाग के अधिकारी और डॉक्टरों की टीम को मौके पर भेजकर आवश्यक सहायता का भरोसा दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

रागिनी का हौसला समाज से पूछ रहा है एक सवाल

सिर्फ सात साल की बच्ची रोज जिस रास्ते से गुजरती है, वह केवल गांव से स्कूल तक का सफर नहीं है। वह संघर्ष से सपनों तक पहुंचने का रास्ता है।

रागिनी की कहानी बताती है कि सुविधाओं की कमी इंसान को रोक सकती है, लेकिन मजबूत इरादों को नहीं।

वन्दे भारत लाइव टीवी न्यूज़ रागिनी के साहस, शिक्षा के प्रति उसके जुनून और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

पाठकों से अपील

अगर आप भी रागिनी के हौसले को सलाम करते हैं, तो कमेंट में उसके लिए दो शब्द जरूर लिखें। ❤️

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