एक ‘चादर’ की ‘धुलाई’ पर पाँच सौ ‘कमीशन’: स्वास्थ्य विभाग के भीतर चादर धुलाई के नाम पर हर साल छह अरब रुपये का बड़ा घोटाला सामने आया है.

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती से विशेष रिपोर्ट: ‘चादर धुलाई’ के नाम पर 6 अरब का घोटाला
🎯 245 रुपये के बजाय 1245 रुपये का खेल: बस्ती के स्थानीय ठेकेदार द्वारा 245 रुपये प्रति चादर का किफायती प्रस्ताव दिया गया था, जिसे खारिज कर ‘श्री एंटरप्राइजेज’ को 1245 रुपये की मनमानी दर से टेंडर दे दिया गया।
🎯 बिना टेंडर प्रक्रिया के अरबों का ऑर्डर: स्वास्थ्य निदेशालय और चिकित्सा आपूर्ति कॉपोरेशन द्वारा बिना पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया के लखनऊ की फर्म को सात अरब का ऑर्डर दे दिया गया।
🎯 कमीशन का खुला खेल और प्रशासनिक मिलीभगत: अस्पतालों के अधिकारियों को प्रति चादर पाँच सौ रुपये का कमीशन देने का लिखित ऑफर दिया गया और स्थानीय स्तर के सस्ते प्रस्तावों को जानबूझकर दरकिनार किया गया।
बस्ती। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में चादर धुलाई जैसी रोजमर्रा की सेवा के नाम पर हर साल अरबों रुपये के सरकारी धन की लूट का सनसनीखेज मामला सामने आया है। बस्ती जिले से उठी इस शिकायत ने चिकित्सा आपूर्ति कॉरपोरेशन की कार्यप्रणाली और टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
245 रुपये बनाम 1245 रुपये – एक हजार का सीधा खेल
मामला सरकारी अस्पतालों में बेड की चादरों की धुलाई से जुड़ा है।
स्थानीय ठेकेदार अविनाश पांडेय द्वारा प्रति चादर धुलाई के लिए मात्र 245 रुपये का व्यावहारिक और किफायती प्रस्ताव दिया गया था।
जबकि चिकित्सा आपूर्ति कॉरपोरेशन, लखनऊ द्वारा लखनऊ की फर्म ‘श्री एंटरप्राइजेज’ को 1245 रुपये प्रति चादर की दर से ठेका दे दिया गया। यानी एक ही काम के लिए सरकार 1000 रुपये प्रति चादर अधिक भुगतान कर रही है।
अगर प्रदेश के अस्पतालों में रोजाना लाखों चादरों की धुलाई होती है तो इस अंतर से सालाना लगभग 6 अरब रुपये का अतिरिक्त बोझ सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।
2023 का टेंडर और 5 कंपनियों को बाहर करने की कहानी
जानकारी के अनुसार कॉरपोरेशन ने वर्ष 2023 में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के 49,400 बेडों की चादर धुलाई के लिए टेंडर आमंत्रित किया था। इस टेंडर में कुल 6 फर्मों ने हिस्सा लिया था।
आरोप है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई। अन्य 5 फर्मों को तकनीकी आधार पर डिस्क्वालीफाई कर दिया गया और पूरे टेंडर को इस तरह डिजाइन किया गया कि लाभ सिर्फ ‘श्री एंटरप्राइजेज’ को मिले।
सूत्रों का कहना है कि बस्ती सहित कई जिलों के CMS और SIC ने कम दर पर स्थानीय स्तर पर काम कराने की कोशिश की, लेकिन ऊपर से आए दबाव और अधिकारियों की मिलीभगत के चलते उन्हें दरकिनार कर दिया गया।
245 रुपये बनाम 1245 रुपये का रेट खेल
- स्थानीय ठेकेदार अविनाश पांडेय द्वारा अस्पतालों में प्रति चादर धुलाई का वास्तविक और किफायती प्रस्ताव मात्र 245 रुपये दिया गया था।
- इसके विपरीत, चिकित्सा आपूर्ति कॉरपोरेशन द्वारा लखनऊ की ‘श्री एंटरप्राइजेज’ को बिना किसी पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया के 1245 रुपये प्रति चादर की दर से मनमाना अनुबंध दे दिया गया।
- इस तरह एक ही सेवा के लिए प्रशासन द्वारा सीधे तौर पर एक हजार रुपये प्रति चादर अधिक भुगतान किया जा रहा है, जिससे जनता के धन की खुली लूट हो रही है।
टेंडर में धांधली और भ्रष्टाचार का जाल
- कॉरपोरेशन ने वर्ष 2023 में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के 49,400 बेड की चादर धुलाई का टेंडर निकाला था, जिसमें कुल छह फर्मों ने भाग लिया था।
- अन्य पांच फर्मों को या तो तकनीकी रूप से अयोग्य (डिस्क्वालीफाई) कर दिया गया या फिर जानबूझकर ‘श्री एंटरप्राइजेज’ को भारी-भरकम फायदा पहुँचाने के रास्ते साफ किए गए।
- बस्तियों के स्थानीय सीएमएस और एसआईसी द्वारा जब कम दरों पर काम कराने का प्रयास किया गया, तो उन्हें अधिकारियों की मिलीभगत से दरकिनार कर दिया गया।
कमीशनखोरी और प्रशासनिक मिलीभगत
- ’श्री एंटरप्राइजेज’ द्वारा जिला अस्पतालों के सीएमएस और एसआईसी को प्रति चादर पाँच सौ रुपये का लालची कमीशन देने का लिखित ऑफर तक दिया गया था।
- स्थानीय ठेकेदार अविनाश पांडेय के 245 रुपये प्रति चादर वाले सस्ते और व्यावहारिक प्रस्ताव को इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि उसमें अधिकारियों की जेब गर्म करने की गुंजाइश नहीं थी।
- इस पूरे नेटवर्क के पीछे रसूखदार ठेकेदारों और विभागीय उच्चाधिकारियों की साठगांठ साफ तौर पर नजर आ रही है, जिससे हर साल राज्य के खजाने को अरबों का चूना लग रहा है।
पाँच सौ रुपये ‘कमीशन’ का लिखित ऑफर
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू कमीशनखोरी का है।
आरोप है कि ‘श्री एंटरप्राइजेज’ की ओर से जिला अस्पतालों के CMS और SIC को प्रति चादर 500 रुपये कमीशन देने का लिखित ऑफर तक दिया गया।
स्थानीय स्तर पर 245 रुपये में होने वाले काम को इसलिए नकार दिया गया क्योंकि उसमें ‘ऊपरी कमाई’ की गुंजाइश नहीं थी। 1245 रुपये के रेट में 500 रुपये कमीशन बांटने के बाद भी ठेकेदार को 745 रुपये बचते हैं, जो वास्तविक लागत से तीन गुना अधिक है।
जनता के पैसे से जेब भरने का नेटवर्क
यह सिर्फ एक टेंडर का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है जिसमें रसूखदार ठेकेदार, कॉरपोरेशन के अधिकारी और जिला स्तर के कुछ अफसर शामिल हैं। सरकारी अस्पताल जहां दवाओं और सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं, वहीं चादर धुलाई जैसी बुनियादी सेवा में इतनी बड़ी लूट स्वास्थ्य व्यवस्था की मंशा पर सवाल उठाती है।
अब सवाल शासन से
1. क्या 245 रुपये में होने वाले काम के लिए 1245 रुपये का भुगतान जनहित में है?
2. 2023 के टेंडर में 5 फर्मों को अयोग्य ठहराने का वास्तविक तकनीकी आधार क्या था?
3. बिना पारदर्शी प्रतिस्पर्धा के एक ही फर्म को प्रदेश भर का ठेका देना किस नियम के तहत हुआ?
4. प्रति चादर 500 रुपये कमीशन के लिखित ऑफर की जांच क्यों नहीं हुई?
बस्ती से उठी यह आवाज अब पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक टेस्ट केस बन गई है। क्या जिला प्रशासन और शासन स्तर पर इस बहुचर्चित चादर धुलाई घोटाले की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र जांच होगी? क्या दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर दंडात्मक कार्रवाई कर जनता के 6 अरब रुपये सालाना बचाए जाएंगे, या यह फाइल भी ठंडे बस्ते में चली जाएगी?
– रिपोर्ट: बस्ती ब्यूरो
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