सरकारी स्कूलों में करोड़ों खर्च, फिर भी क्यों फेल है पढ़ाई?

सरकारी विद्यालयों की बदहाली पर बड़ा सवाल: क्या व्यवस्था में बदलाव का समय आ गया है?
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती ।। सरकारी विद्यालयों को बेहतर बनाने के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये का बजट देती है। शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन, बच्चों को मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील और तमाम सुविधाएं दी जाती हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि आज भी कई सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन, साफ-सफाई और बच्चों की देखभाल को लेकर अभिभावकों में असंतोष है। प्राइवेट स्कूलों की तरफ बढ़ता रुझान इसी का परिणाम है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है – आखिर कमी कहां रह गई और समाधान क्या है?
1. जमीनी हकीकत क्या है?
बस्ती सहित पूर्वांचल के कई जिलों में सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों का दौरा करने पर कुछ सामान्य समस्याएं सामने आती हैं:
क) पढ़ाई से ज्यादा कागजी काम: कई शिक्षक मध्यान्ह भोजन, डीबीटी, जनगणना, चुनाव ड्यूटी और अन्य सरकारी योजनाओं के कागजी कार्यों में इतने उलझे हैं कि कक्षा में पढ़ाने के लिए पूरा समय नहीं दे पाते।
ख) जवाबदेही की कमी: स्थायी नियुक्ति के बाद ट्रांसफर-पोस्टिंग और वेतन पर कोई असर न पड़ने से कुछ जगहों पर लापरवाही भी देखने को मिलती है। समय से स्कूल न आना, कक्षा में देरी से जाना जैसी शिकायतें आम हैं।
ग) संसाधनों का दुरुपयोग: मिड-डे मील, गैस सिलेंडर, राशन, सफाई और मरम्मत के मद में आने वाला पैसा कई जगह पूरी पारदर्शिता से खर्च नहीं होता। बच्चों को मेन्यू के अनुसार भोजन न मिलना या गुणवत्ता खराब होना इसकी बड़ी वजह है।
घ) अभिभावकों का भरोसा टूटना: जब स्कूल में न पढ़ाई अच्छी होगी, न साफ-सफाई, तो गरीब से गरीब अभिभावक भी कर्ज लेकर अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में डालने को मजबूर होता है।
2. एक नया विचार: क्या बेरोजगार योग्य युवाओं को मौका मिलना चाहिए?
इसी पृष्ठभूमि में एक वैकल्पिक मॉडल पर चर्चा तेज हो रही है –
क्यों न शिक्षित, योग्य और बेरोजगार युवाओं को ₹25,000 प्रतिमाह के निश्चित मानदेय पर संविदा/निश्चित अवधि के लिए सह-शिक्षक के रूप में नियुक्त किया जाए?
जिस तरह स्वास्थ्य विभाग में संविदा स्टाफ, रेलवे, बैंक और अन्य क्षेत्रों में निश्चित अवधि पर युवाओं को अवसर दिया जाता है, उसी तरह शिक्षा में भी प्रयोग किया जा सकता है।
इस व्यवस्था के संभावित लाभ:
• ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा: नया युवा रोजगार बचाने और खुद को साबित करने के लिए अधिक मेहनत करेगा। उसे पता होगा कि उसका मूल्यांकन हर 6 महीने या साल में होगा।
• योग्यता आधारित चयन: नियुक्ति केवल मेरिट, TET/CTET और डेमो क्लास के आधार पर हो, सिफारिश पर नहीं।
• प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन: शिक्षक का मूल्यांकन इन 4 बिंदुओं पर हो –
1. बच्चों की उपस्थिति दर में सुधार
2. बच्चों के सीखने के स्तर (लर्निंग आउटकम) में प्रगति
3. विद्यालय में अनुशासन और साफ-सफाई
4. अभिभावकों का फीडबैक
• सरकार पर कम वित्तीय बोझ: एक स्थायी शिक्षक के वेतन में 2-3 योग्य युवाओं को अवसर दिया जा सकता है, जिससे अधिक स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध हो सकेंगे।
यह प्रस्ताव किसी को हटाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था में सहयोग और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा लाने का है। स्थायी शिक्षक अपने अनुभव से मार्गदर्शन दें और युवा शिक्षक अपनी ऊर्जा से कक्षाओं को जीवंत बनाएं – यह मॉडल आदर्श हो सकता है।
3. क्या होना चाहिए – तत्काल सुधार के 5 सुझाव
1. पारदर्शी ऑडिट: हर विद्यालय के मिड-डे मील, राशन, गैस, सफाई मद का खर्च सार्वजनिक हो। स्कूल की दीवार पर हर महीने का खर्च और मेन्यू लिखा जाए। ग्राम प्रधान, अभिभावक संघ और एसएमसी को इसकी निगरानी का अधिकार मिले।
2. थर्ड पार्टी मूल्यांकन: बच्चों की पढ़ाई का मूल्यांकन उसी स्कूल के शिक्षक नहीं, बल्कि बाहर की टीम करे।
3. पायलट प्रोजेक्ट: सरकार एक जिले में 50-100 विद्यालयों को चुनकर इस संविदा मॉडल का 2 साल का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करे। परिणाम बेहतर आने पर इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाए।
4. शिकायत और कार्रवाई तंत्र: यदि कहीं भोजन में गड़बड़ी या लापरवाही की शिकायत मिले तो उसकी निष्पक्ष जांच 15 दिन में हो और दोषी पर सख्त कार्रवाई हो।
5. शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्य से मुक्ति: शिक्षक का मुख्य काम केवल पढ़ाना होना चाहिए।
निष्कर्ष
सवाल सरकारी शिक्षकों के विरोध का नहीं है। हमारे सरकारी स्कूलों में आज भी सैकड़ों समर्पित शिक्षक हैं जो बेहतरीन काम कर रहे हैं। सवाल व्यवस्था का है। सवाल यह है कि जब संसाधन और वेतन दोनों प्राइवेट से बेहतर हैं, तो परिणाम बेहतर क्यों नहीं?
समय आ गया है कि हम लीक से हटकर सोचें। योग्य बेरोजगार युवाओं को अवसर देना, पारदर्शिता लाना और जवाबदेही तय करना – शायद यही वह त्रिमूर्ति है जो सरकारी विद्यालयों में फिर से विश्वास लौटा सकती है। क्योंकि अंत में लक्ष्य एक ही है – हर गरीब के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
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