जिला रिपोर्टर सुरेश चौहान आगर मालवा मध्य प्रदेश रात में मां कालिका स्वयं करती हैं अपना श्रृंगार! आगर के कालका माता मंदिर से जुड़ी है अनूठी जनश्रुति *शारदीय नवरात्र में उमड़ता है आ

आगर-मालवा। आस्था, इतिहास और परंपराओं का संगम… एक ऐसा शक्तिधाम, जहां मां कालिका के रात्रि में स्वयं श्रृंगार करने की जनश्रुति प्रचलित है। जहां मनोकामना पूर्ति की आस लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं और नवरात्र में भक्ति का सैलाब उमड़ पड़ता है। जिला मुख्यालय आगर में काशीबाई स्मारक के समीप स्थित प्रसिद्ध कालका माता मंदिर मां महाकाली की आराधना का प्रमुख केंद्र है। मंदिर से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, अखंड ज्योत की परंपरा और नवरात्र के विशेष अनुष्ठान इसे विशिष्ट पहचान देते हैं।
*नींव की खुदाई में मिली थी मां कालिका की प्रतिमा*
मंदिर के पुजारी सागरमल राजोरिया के अनुसार, मंदिर का प्राकट्य चमत्कारिक माना जाता है। मान्यता है कि वर्तमान मंदिर स्थल पर प्रारंभ में केवल एक त्रिशूल स्थापित था। मां कालिका के प्राकट्य से पहले पुजारी को 'जत्रा' के दौरान कुछ अलौकिक संकेत प्राप्त हुए थे। इसके कुछ समय बाद समीप स्थित एक मकान की नींव की खुदाई के दौरान मां कालिका की प्राचीन पाषाण प्रतिमा जमीन से प्राप्त हुई। इसके बाद विधि-विधान से प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया। तभी से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
*प्राचीन प्रतिमाएं और 38 वर्षों से प्रज्वलित अखंड ज्योत*
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में मां महाकाली की तेजस्वी पाषाण प्रतिमा के साथ मां हिंगलाज और भैरव महाराज की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। प्रतिमाओं की बनावट और शिल्प शैली प्राचीन मालवा की मूर्तिकला से साम्यता रखती है। मंदिर की एक विशेष पहचान यहां पिछले 38 वर्षों से अनवरत प्रज्वलित अखंड ज्योत है। मान्यता के अनुसार, यह ज्योत हिमाचल प्रदेश स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां ज्वालामुखी मंदिर से लाई गई थी। अखंड ज्योत मंदिर की धार्मिक परंपरा और शक्तिपीठों से जुड़े आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक मानी जाती है।
*रात में मां स्वयं करती हैं श्रृंगार, सुबह अस्त-व्यस्त मिलती है सामग्री*
कालका माता मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित जनश्रुतियों में मां कालिका के स्वयं श्रृंगार करने की मान्यता शामिल है। स्थानीय किंवदंती के अनुसार, मां रात्रि में स्वयं अपना श्रृंगार करती हैं। पुजारी सागरमल राजोरिया के अनुसार, गर्भगृह में रखी श्रृंगार सामग्री सुबह अक्सर अस्त-व्यस्त मिलती है। श्रद्धालु इसे मां की उपस्थिति और उनकी लीला से जोड़कर देखते हैं। यह मान्यता मंदिर के प्रति भक्तों की आस्था को और गहरा करती है।
*'चटक से पट्टा' की परंपरा, मनोकामना पूरी होने की मान्यता*
मंदिर में 'चटक से पट्टा' मिलने की अनूठी परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि मां की ओर से संकेत मिलने पर भक्तों के रुके हुए कार्य पूरे हो जाते हैं। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां के दरबार में पहुंचते हैं।
संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाले दंपतियों के लिए भी यह मंदिर विशेष आस्था का केंद्र है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में पालने या झूले बांधकर मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर मां के दरबार में पहुंचकर आभार व्यक्त करते हैं।
*वैदिक और तांत्रिक परंपरा से होती है पूजा-अर्चना*
मंदिर में वैदिक और तांत्रिक, दोनों परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिदिन सुबह और शाम नियमित आरती होती है। प्रत्येक माह अमावस्या की रात्रि में विशेष तांत्रिक पूजा का आयोजन किए जाने की परंपरा है। मंदिर की पूजा-पद्धति और धार्मिक अनुष्ठान इसे आस्था के साथ-साथ पारंपरिक साधना का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं।
मंदिर की देखरेख, साफ-सफाई, नियमित पूजन और अखंड ज्योत की व्यवस्था पुजारी सागरमल राजोरिया का परिवार परंपरागत रूप से संभालता है। नवरात्र जैसे बड़े पर्वों पर स्थानीय प्रशासन और नगर के स्वयंसेवी युवा भी व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं।
*महाअष्टमी की रात विशेष हवन, नवमी पर निकलता है भव्य चल समारोह*
शारदीय नवरात्र के दौरान कालका माता मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। नौ दिनों तक मां का विशेष श्रृंगार, अनुष्ठान और अखंड पाठ किया जाता है। परंपरा के अनुसार, पहले महाअष्टमी की मध्यरात्रि में श्मशान स्थल पर विशेष हवन आयोजित किया जाता था। मान्यता थी कि इस दौरान मां अग्नि स्नान करती हैं। वर्तमान में यह विशेष हवन महाअष्टमी की रात मंदिर परिसर में वैदिक विधि से संपन्न होता है।
नवमी पर बाड़ी विसर्जन मंदिर का प्रमुख धार्मिक आयोजन है। इस दिन मंदिर की पावन बाड़ी उठाई जाती है और विशाल चल समारोह के रूप में श्मशान स्थल तक ले जाई जाती है। वहां विशेष हवन के बाद बाड़ी का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के दर्शन के लिए नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
*नवमी पर 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान*
सामान्य दिनों में मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि शारदीय नवरात्र में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। नवमी के चल समारोह और बाड़ी विसर्जन के अवसर पर 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति रहती है।
आगर का कालका माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि जनश्रुतियों, प्राचीन परंपराओं और लोकआस्था का जीवंत प्रतीक है। मां महाकाली के प्रति अटूट विश्वास, अखंड ज्योत और नवरात्र के विशेष अनुष्ठान इस शक्तिधाम को आगर-मालवा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं।
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