भारत के 10 दीवानी के सबसे मजबूत जजमेंट जो आज भी मुकदमे पलट देते हैं !

भारत के 10 सबसे मजबूत और गेम-चेंजर दीवानी व संवैधानिक जजमेंट नीचे दिए गए हैं ! यशपाल जैन बनाम सुशीला देवी (2023)
महत्व: यह दीवानी मुकदमों में होने वाली अनावश्यक देरी और तारीख-पर-तारीख की परंपरा को पलटने वाला ऐतिहासिक फैसला है।
असर:
सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया। इसके तहत कोर्ट बेवजह स्थगन (Adjournments) देने पर जुर्माना लगा सकती है और 5 साल से पुराने दीवानी मामलों की कड़ी निगरानी की जाती है !
2-एम. सिद्दीकी बनाम महंत सुरेश दास (2019) – अयोध्या विवाद
महत्व:
भारत के इतिहास का सबसे बड़ा भूमि और मालिकाना हक (Title Suit) का दीवानी मामला !
असर इस फैसले ने साबित किया कि केवल आस्था के आधार पर जमीन का मालिकाना हक तय नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए दस्तावेजी और पुरातात्विक साक्ष्य (Possessory Title) जरूरी हैं। इसने दीवानी मामलों में सबूतों के मूल्यांकन की नई परिभाषा तय की।
3-मौलिक अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Fundamental Rights & Liberty)
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)• महत्व:
भारतीय न्यायपालिका का अब तक का सबसे बड़ा और शक्तिशाली फैसला। असर: 13 जजों की पीठ ने 'मूल संरचना का सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) दिया।
इसके तहत संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढांचे
(जैसे लोकतंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता)
को नष्ट नहीं कर सकती। सरकार के किसी भी मनमाने कानून को पलटने के लिए यह आज भी सबसे बड़ा हथियार है।
4-मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978)
महत्व: अनुच्छेद 21
(Right to Life & Personal Liberty) का दायरा बढ़ाने वाला मामला। असर:
कोर्ट ने साफ किया कि सरकार किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केवल एक 'कानूनी प्रक्रिया' बनाकर नहीं छीन सकती, बल्कि वह प्रक्रिया उचित, निष्पक्ष और तार्किक
(Just, Fair and Reasonable) होनी चाहिए।
प्रशासन के किसी भी एकतरफा आदेश को कोर्ट इस जजमेंट के आधार पर तुरंत निरस्त कर देता है ! 5-जस्टिस के.
एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)• महत्व: निजता के अधिकार
(Right to Privacy) को मान्यता।
असर:
9 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से 'निजता के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया। डेटा सुरक्षा, सर्विलांस और व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े किसी भी सरकारी या निजी दखल को पलटने के लिए यह जजमेंट रामबाण है !
सामाजिक न्याय और आरक्षण
(Social Justice & Reservation)
6-इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992)
महत्व:
इसे 'मंडल केस' के नाम से भी जाना जाता है। असर: सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी (OBC) आरक्षण को वैध माना लेकिन आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर दी और 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत पेश किया।
जब भी कोई राज्य सरकार राजनीति के तहत 50% से ज्यादा आरक्षण देने की कोशिश करती है, कोर्ट इसी जजमेंट के आधार पर उसे असंवैधानिक घोषित कर देता है ! 7-प्रशासनिक जवाबदेही और संघवाद (Governance & Federalism)
एस.
आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
महत्व: राज्यों में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के दुरुपयोग पर रोक।असर: कोर्ट ने व्यवस्था दी कि किसी राज्य सरकार की बर्खास्तगी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आती है।
बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर (Floor Test) होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा मनमाने ढंग से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराने के फैसलों को पलटने में यह जजमेंट आज भी सबसे मजबूत दीवार है।
8-मानवाधिकार और लैंगिक समानता (Human Rights & Gender Equality)विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)
महत्व:कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ ऐतिहासिक कदम। असर:
जब तक संसद ने कानून नहीं बनाया, सुप्रीम कोर्ट ने खुद कड़े दिशानिर्देश
(Vishakha Guidelines) जारी किए, जो बाद में POSH Act, 2013 का आधार बने।
कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों से जुड़े मुकदमों में यह मील का पत्थर है ! 9-शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) –तीन तलाक मामला
महत्व: मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की रक्षा।
असर: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की प्रथा को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया।पारिवारिक और दीवानी कानूनों के तहत मनमाने ढंग से विवाह तोड़े जाने के खिलाफ यह महिलाओं के लिए एक बेहद मजबूत कानूनी ढाल बना ! 10-नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018)
महत्व:
व्यक्तिगत पहचान और समानता का अधिकार।
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