
अजीत मिश्रा (खोजी)
मुड़घाट: विकास के नाम पर ‘खंडहर’ और जनता की गाढ़ी कमाई की ‘अंत्येष्टि’
बुधवार 14 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती। सरकारी सिस्टम की बेशर्मी देखनी हो तो शहर से सटे मुड़घाट चले आइए। यहाँ विकास का एक ऐसा ‘स्मारक’ खड़ा है, जहाँ छह साल पहले सवा करोड़ रुपये फूंक दिए गए, लेकिन आज तक एक भी शव का अंतिम संस्कार नसीब नहीं हुआ। अब उसी विफलता पर पर्दा डालने के लिए नगर पालिका प्रशासन फिर से 39 लाख रुपये की ‘नई आहुति’ देने जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह विकास है या जनता के टैक्स के पैसों का खुला अपमान?
सवा करोड़ का ‘सफेद हाथी’
छह साल पहले जब सवा करोड़ रुपये की लागत से यहाँ अंत्येष्टि स्थल बना था, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे। इंटरलॉकिंग सड़कें, शौचालय, हैंडपंप और सीढ़ियों का जाल बिछाया गया। लेकिन आज हकीकत यह है कि वह पूरा परिसर एक भूतिया खंडहर में तब्दील हो चुका है। जिस जगह को लोगों के दुख में काम आना था, वह प्रशासनिक अनदेखी और घटिया योजना के कारण खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
आखिर जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सवा करोड़ रुपये खर्च हुए थे, तब वे सुविधाएँ क्यों नहीं सुनिश्चित की गईं जिनकी वजह से आज इसे ‘निष्प्रयोज्य’ घोषित करना पड़ा?
- क्या उस समय के इंजीनियरों और अधिकारियों ने बिना किसी योजना के यह ढांचा खड़ा कर दिया था?
- क्या उन सवा करोड़ रुपयों की बंदरबांट की कोई जांच होगी?
- अब जो 39 लाख रुपये फिर से खर्च किए जा रहे हैं, इसकी क्या गारंटी है कि साल-दो साल बाद यह भी ‘खंडहर’ नहीं बनेगा?
सिस्टम की ‘अंतिम क्रिया’
मुड़घाट की यह तस्वीर केवल एक अंत्येष्टि स्थल की नहीं, बल्कि हमारी कार्यप्रणाली के ढर्रे की है। एक तरफ बजट की कमी का रोना रोया जाता है, और दूसरी तरफ करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट्स को बिना उपयोग के सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह विडंबना ही है कि जिस स्थान को अंतिम संस्कार के लिए बनाया गया, प्रशासन ने वहां अपनी कार्यकुशलता का ही अंतिम संस्कार कर दिया।
नगर पालिका प्रशासन को अब केवल टेंडर निकालने और निर्माण कार्य शुरू करने से पहले जनता को यह जवाब देना चाहिए कि पुराने सवा करोड़ रुपयों की बर्बादी के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया गया है। क्या सिर्फ नया बजट ठिकाने लगाना ही विकास है?













