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आधुनिकता की दौड़ में खत्म हुआ पारंपरिक रस्सी उद्योग

प्लास्टिक ने छीनी पहचान, सरकारी प्रोत्साहन न मिलने से ग्रामीण हुए बेरोजगार

जगम्मनपुर, जालौन।
विकास खंड रामपुरा के नदी तटवर्ती गाँव—कंजौसा, मल्लाहनपुरा, पतराही सहित निषाद बहुल बस्तियों में कभी मूंज और डाब घास से रस्सी बनाने का पारंपरिक उद्योग ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा था। चारपाइयाँ भरने से लेकर गेहूँ, बाजरा, अरहर, तिल्ली और सरसों की कटाई के वक्त गट्ठर बाँधने तक, इस रस्सी के बिना खेत-खलिहान का काम अधूरा माना जाता था। बुजुर्ग बताते हैं कि आज़ादी के बाद के दशकों में इन गाँवों में 70–80% घरों में यह काम होता था—घर की स्त्रियाँ घास तैयार करतीं और पुरुष हाट-बाज़ार में बेचते। समय के साथ यह श्रमसाध्य हुनर बाजार में दाम न मिलने और सस्ते विकल्पों के चलते धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया।

कंजौसा के ग्रामीण विक्रम, सुघर सिंह निषाद, रामनारायण, रामजी, प्रीतम सिंह, छोटेलाल, रमेशचंद्र, विजय सिंह, रसीले, बिहारी, राधेश्याम और रामगोपाल बताते हैं—“यह काम सामूहिक श्रम और सहयोग की पहचान था। सुबह से शाम तक मूंज/डाब काटना, सुखाना, पानी में भिगोकर नरम करना और हाथ से मरोड़कर रस्सी बनाना—सब मिलकर होता था। लेकिन मेहनत के मुकाबले दाम हमेशा कम मिले।” स्थानीय हाट में जहाँ एक किलो प्राकृतिक रस्सी के 15–20 रुपये तक मिलते थे, वहीं 1990 के दशक के बाद बाजार में आई रंग-बिरंगी प्लास्टिक रस्सियाँ इससे भी सस्ती और हर दुकान पर उपलब्ध हो गईं। नतीजा—पारंपरिक रस्सी का बाजार सिमटता चला गया और आज हाल यह है कि कुछ बुजुर्गों को छोड़ अधिकांश युवा इस हुनर से किनारा कर चुके हैं।

*स्थानीय प्रशासनिक परिदृश्य: कितने गाँव, कैसी स्थिति

जालौन ज़िला प्रशासन के अनुसार जिले में रामपुरा सहित कुल 9 विकास खंड हैं। रामपुरा ब्लॉक में लगभग 84 गाँव आते हैं—यानी प्रभाव का दायरा सीमित नहीं, बल्कि व्यापक है। यह संख्या इस बात का संकेत है कि यदि पारंपरिक गृह-उद्योगों को फिर से जीवित करने की पहल हो, तो इससे सैकड़ों परिवारों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।

*इतिहास की गवाही: ‘डाब’ रस्सी का दस्तावेज़ी जिक्र

पारंपरिक ‘डाब’ (दर्भ/कुशा-प्रजाति) घास की रस्सी का उल्लेख आधिकारिक अभिलेखों में भी मिलता है। भारत की जनगणना विभाग के 1961 के गाँव-एकलाख्यान (Village Survey Monograph) में नदी-नालों के किनारे पाई जाने वाली डाब घास से बनी रस्सियों का स्पष्ट वर्णन है—यह बताता है कि बुंदेलखंड समेत गंगा-यमुना के दोआब में यह सामग्री न सिर्फ उपलब्ध थी, बल्कि रोज़मर्रा के औज़ारों में प्रयुक्त भी होती थी।

क्यों टूटी यह कारीगरी-श्रृंखला

— मूल्य-श्रृंखला का अभाव
कच्चे माल की उपलब्धता होते हुए भी फ़सल-पूर्व/उत्तर प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, मानकीकरण और थोक विपणन की सुविधाएँ नहीं बन पाईं।

— सस्ते विकल्पों की मार
प्लास्टिक रस्सियाँ सस्ती और ‘टिकाऊ’ बताकर बेची गईं, जबकि प्राकृतिक रस्सियाँ कारीगर-घंटों पर निर्भर रहीं।

— नीतिगत प्राथमिकताएँ कहीं और
उत्तर प्रदेश सरकार की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP)’ सूची में जालौन का चयन “हैंडमेड पेपर आर्ट” के लिए है—रस्सी/प्राकृतिक रेशे नहीं। केंद्र सरकार की PMFME-ODOP सूची में जालौन “मटर-आधारित उत्पाद” के रूप में चिह्नित है। दोनों स्तरों पर प्राथमिकता अन्य उत्पादों को मिली; प्राकृतिक रस्सी शिल्प को कोई औपचारिक प्रोत्साहन नहीं मिला।

*पर्यावरण और संस्कृति—दोनों का नुकसान

मूंज और संबद्ध घासें सदियों से भारत की कारीगरी और घरेलू उपयोग का हिस्सा रही हैं—टोकरी, बैठन, फर्नीचर-फ्रेम और रस्सी तक। यह जैव-अवक्रमणीय और पर्यावरण-अनुकूल रेशा है। दूसरी तरफ, प्लास्टिक रस्सियाँ उपयोग के बाद सालों तक मिट्टी-पानी में बनी रहती हैं और कचरा-प्रबंधन का बोझ बढ़ाती हैं। शिल्प-इतिहास पर काम करने वाले अध्ययनों में मूंज शिल्प को आज भी कई इलाकों—खासकर यूपी/बिहार—में महिलाओं की आय-वृद्धि से जोड़ा गया है; यानी उचित बाज़ार और प्रशिक्षण मिले तो यह अब भी रोज़गार-सृजन कर सकता है।

*आज की तस्वीर: बेरोज़गारी और पलायन

गाँवों के युवा, जिन्हें रोज़गार चाहिए, वे शहरों—कानपुर, झाँसी, दिल्ली, ग्वालियर—की ओर निकल रहे हैं। महिलाएँ, जो कभी घर बैठे रस्सी बनाकर आय जोड़ती थीं, अब अवसर न मिलने से बाहर हो गई हैं। रामपुरा ब्लॉक के 84 गाँवों जैसे बड़े दायरे में जब घरेलू-उद्योग शिथिल होता है, तो असर पानी की लहर की तरह हर घर तक पहुँचता है—यह स्थिति विकास आँकड़ों में भी दिखती है, पर स्थानीय हुनर पर आधारित समाधान अब तक प्राथमिकता नहीं बन पाए।

*क्या हो सकता है—जमीनी, व्यावहारिक रोडमैप

क्लस्टर और सहकारी समितियाँ: ब्लॉक स्तर पर प्राकृतिक-रेशा क्लस्टर बनें; घास की नियंत्रित/समझदारीपूर्ण कटाई, प्राथमिक प्रसंस्करण (सुखाना, धूप-सीज़निंग, बंडलिंग) और मानकीकरण यहीं हो।

प्रशिक्षण व टूलकिट: युवाओं/महिलाओं के लिए 15–30 दिन के मॉड्यूलर प्रशिक्षण; सरल टूलकिट (ट्विस्टर/हैंड-ग्रिप) से उत्पादकता 25–35% तक बढ़ सकती है।

ब्रांडिंग और ई-मार्केटिंग: ODOP/PMFME ढाँचों से उत्पाद-आधारित नहीं, ‘सामग्री-आधारित उप-घटक’ के रूप में पायलट—“जालौन नैचुरल फ़ाइबर” ब्रांड—जिसमें चारपाई-रस्सी, गाठ-बंडल रस्सी, बागवानी/कृषि हेतु बायोडिग्रेडेबल बंधन-ट्वाइन जैसे उत्पाद हों।

सार्वजनिक खरीद के प्रयोग: पंचायत/वन विभाग/बागवानी मिशन द्वारा स्थानीय परियोजनाओं (नर्सरी-टाई, खेत-बंधान, चारपाई मरम्मत) में प्राकृतिक रस्सी की प्राथमिकता—छोटी-छोटी स्थिर माँग कारीगरों का हौसला लौटाती है।

इंसेट—–
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पर्यावरण-लाभ का मुद्रीकरण: प्लास्टिक-प्रतिस्थापन पर ‘ग्रीन क्रेडिट’/CSR पायलट—स्थानीय SHG/समितियों को उपकरण और कार्यशील पूँजी।

पारंपरिक रस्सी उद्योग का पतन केवल एक घरेलू उत्पाद के गुम होने की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण पहचान, सामूहिक श्रम और पर्यावरणीय संतुलन के क्षरण का प्रतीक है। प्रशासनिक भू-तंत्र बताता है कि रामपुरा जैसा बड़ा ब्लॉक (9 में से एक) और उसके 80+ गाँव यदि प्राकृतिक रेशा क्लस्टरों से जोड़े जाएँ तो रोज़गार, आय और पर्यावरण—तीनों में सुधार संभव है। ODOP/PMFME की मौजूदा प्राथमिकताएँ भले अन्य उत्पादों पर हों, पर जिला-उपयोजनाओं के जरिए प्राकृतिक रस्सी शिल्प को उप-घटक/क्लस्टर मॉडल में स्थान दिया जा सकता है। इतिहास (1961 के अभिलेख) से लेकर आज के पर्यावरण-तर्क तक, सब संकेत यही देते हैं—सही नीति-सहारा और बाज़ार-आश्रय मिले, तो मूंज-डाब की रस्सी फिर से गाँवों की आजीविका का मजबूत सहारा बन सकती है।

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