

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में चल रही नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई अब अपने सबसे अहम और संवेदनशील पड़ाव पर पहुंच चुकी है। सरकार द्वारा तय की गई डेडलाइन में अब महज 8 दिन शेष हैं, और जैसे-जैसे समय करीब आ रहा है, बीजापुर के घने जंगलों में हलचल तेज होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित परिवारों में बेचैनी और चिंता चरम पर है।
बीजापुर में अब भी 60 से ज्यादा नक्सली सक्रिय
सूत्रों के अनुसार, बीजापुर जिले में अभी भी लगभग 60 से अधिक नक्सलियों के सक्रिय होने की जानकारी सामने आई है। इनमें कुख्यात नक्सली कमांडर पापा राव और सोढ़ी केशा जैसे नाम शामिल हैं, जो लंबे समय से सुरक्षाबलों के निशाने पर हैं। लगातार चल रहे ऑपरेशन और मुठभेड़ों के बीच सुरक्षाबलों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
बढ़ते दबाव के बीच डर में जी रहे परिजन
सुरक्षाबलों की सख्त कार्रवाई और संभावित मुठभेड़ों को देखते हुए अब नक्सलियों के परिवारों में भय और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। परिजनों को यह डर सता रहा है कि कहीं उनके अपने ही मुठभेड़ों में मारे न जाएं। यही वजह है कि अब वे खुलकर अपने बेटों और रिश्तेदारों से आत्मसमर्पण करने और घर लौटने की अपील कर रहे हैं।
कमकानार गांव से आई दिल को छू लेने वाली अपील
इसी बीच बीजापुर के ग्राम कमकानार से एक बेहद भावुक और मानवीय पहल सामने आई है। यहां के निवासी और नक्सली कमांडर सूर्यपाल बोड्डू के परिवार ने उसे आत्मसमर्पण करने के लिए भावुक संदेश भेजा है।
उसके दो भाइयों और भतीजे ने साफ शब्दों में कहा—
“अब जंगल में हालात पहले जैसे नहीं रहे, हथियार उठाने का कोई औचित्य नहीं बचा है। जब बड़े-बड़े कमांडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं, तो सूर्यपाल को भी अब घर लौट आना चाहिए।”
2008 से जंगल की जिंदगी, अब लौटने की पुकार
परिजनों के मुताबिक, सूर्यपाल बोड्डू वर्ष 2008 में नक्सली संगठन में शामिल हुआ था और तब से झारखंड, गरियाबंद और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में सक्रिय रहा है। वर्षों तक संघर्ष और हिंसा के रास्ते पर चलने के बाद अब परिवार उसे सामान्य और सुरक्षित जीवन की ओर लौटने की अपील कर रहा है।
“समय बदल चुका है, अब जिंदगी को चुनो”
परिवार ने बेहद भावुक शब्दों में कहा—
“अब समय बदल चुका है। जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य होना चाहिए। हम चाहते हैं कि सूर्यपाल वापस घर लौट आए और परिवार के साथ नई शुरुआत करे।”
निर्णायक मोड़ पर खड़ी लड़ाई
नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अब सिर्फ सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच नहीं रही, बल्कि यह भावनाओं, परिवारों और भविष्य की लड़ाई बन चुकी है। एक ओर जहां सरकार इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी ओर परिजनों की अपीलें इस संघर्ष को मानवीय रूप दे रही हैं।






