
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। आबकारी विभाग या शराब माफिया का ‘सहयोगी’? बस्ती में नियम कानून रद्दी की टोकरी में ।।
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
बस्ती ।। क्या बस्ती जिले में सरकारी कानून का अस्तित्व खत्म हो चुका है? हर्रैया और कुदरहा क्षेत्र से आ रही तस्वीरें यह चीख-चीख कर बता रही हैं कि यहाँ ‘जंगलराज’ है, जहाँ शराब माफियाओं ने कानून को अपनी जेब में रख लिया है। आबकारी विभाग की नाक के नीचे चल रहे इस गोरखधंधे को ‘लापरवाही’ कहना गलत होगा, यह स्पष्ट रूप से एक संवैधानिक अपराध और मिलीभगत है।
शर्मनाक हकीकत:
खुलेआम लूट: सुबह 10 बजे खुलने वाली दुकानें 7 बजे ही ग्राहकों को नशे के दलदल में धकेलने के लिए तैयार खड़ी हैं। यह केवल समय का उल्लंघन नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों और मेहनतकश वर्ग को उजाड़ने की एक सुनियोजित साजिश है।
जेब पर डकैती: MRP से 20 से 50 रुपये तक की अवैध वसूली क्या सीधे-सीधे ‘डकैती’ नहीं है? सेल्समैनों की बदसलूकी और ‘ऊपर तक सेटिंग’ का रौब यह साबित करता है कि इन्हें कानून का तनिक भी डर नहीं है।
बिना ढाल के ग्राहक: न रेट लिस्ट, न टोल-फ्री नंबर, और न ही नियम। क्या आबकारी विभाग ने शराब माफियाओं को लाइसेंस ‘लूटने की खुली छूट’ के तौर पर दिया है?
विभाग की चुप्पी—मिलीभगत का सबूत
आबकारी निरीक्षक क्या सो रहे हैं? या फिर उन्हें इस अवैध वसूली से मिलने वाले ‘हिस्से’ ने अंधा कर दिया है? जब पूरी जनता को दिख रहा है कि दुकानों के पीछे के रास्ते से अवैध शराब बिक रही है, तो विभाग को क्यों कुछ दिखाई नहीं देता? यह ‘जानबूझकर बनी हुई अज्ञानता’ ही भ्रष्टाचार की जड़ है।
प्रशासन के लिए सीधी चुनौती
एस.पी. पांडे ने जांच और कार्रवाई का जो ढकोसला किया है, जनता अब उससे संतुष्ट होने वाली नहीं है।
हमारी सीधी मांग है:
तुरंत गिरफ्तारी: उन दुकानदारों को सलाखों के पीछे डाला जाए जो ओवररेटिंग और अवैध समय पर बिक्री कर रहे हैं।
जवाबदेही: उन आबकारी निरीक्षकों को तुरंत निलंबित किया जाए जिनके क्षेत्र में यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है।
लाइसेंस रद्द: केवल नोटिस नहीं, सीधे लाइसेंस निरस्त किए जाएं।
प्रमुख मुद्दे:
समय की धज्जियां: निर्धारित समय सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक है, लेकिन दुकानों के शटर सुबह 7 बजे ही उठ जाते हैं। यह न केवल नियम का उल्लंघन है, बल्कि उन लोगों को नशे का आदी बनाने की साजिश है जो सुबह काम पर निकलते हैं।
ओवररेटिंग का खेल: एमआरपी (MRP) से अधिक दाम वसूलना एक आम बात हो गई है। बीयर और अंग्रेजी शराब की हर बोतल पर 20 से 50 रुपये और देशी शराब पर 5 से 10 रुपये की अवैध वसूली ग्राहकों की जेब पर डाका डालने जैसा है।
प्रशासनिक चुप्पी: दुकानों के बाहर रेट लिस्ट, समय सारणी और टोल-फ्री नंबर का बोर्ड लगाना अनिवार्य है। फिर भी, अधिकांश दुकानों पर ये नदारद हैं। आबकारी निरीक्षकों द्वारा ‘औचक निरीक्षण’ न करना, सीधे तौर पर विभाग की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
अराजकता का माहौल: दुकानों के बाहर सुबह-सुबह लगने वाली भीड़ से स्थानीय निवासियों के लिए असुरक्षा और अराजकता का वातावरण पैदा हो गया है।
सवाल जो पूछे जाने चाहिए:
यदि नियम तय हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या आबकारी निरीक्षकों को दुकानों के पीछे से हो रही बिक्री की खबर नहीं है, या वे खबर जानकर भी अनजान बने हुए हैं?
डीसी एसपी पांडे ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई कागजों तक सीमित रहेगी या दोषियों पर सख्त कानूनी चाबुक चलेगा?
प्रशासन को यह समझना होगा कि उनकी ढिलाई का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। जब नियमों का पालन कराने वाली संस्था ही मूकदर्शक बन जाए, तो कानून का डर खत्म हो जाता है। अब वक्त आ गया है कि आबकारी विभाग अपनी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और दोषियों पर लाइसेंस निरस्तीकरण जैसी सख्त कार्रवाई करे, ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके।
चेतावनी: यदि प्रशासन ने अब भी अपनी आंखें नहीं खोलीं, तो यह अराजकता पूरे जिले की कानून-व्यवस्था को निगल जाएगी। जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई देखना चाहती है। क्या अधिकारी अपनी वर्दी की लाज बचाएंगे या शराब माफियाओं के गुलाम बने रहेंगे?
















