
धमतरी/ वन परिक्षेत्र कार्यालय नगरी में पदस्थ एक वन कर्मचारी द्वारा विगत लगभग 40 वर्षों से बाबू (लिपिक) का कार्य कराए जाने का मामला सामने आया है। यह स्थिति न केवल विभागीय नियमों के विरुद्ध मानी जा रही है, बल्कि इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार संबंधित वन कर्मचारी का मूल निवास नगरी है। करीब 40 वर्ष पूर्व वह इसी वन परिक्षेत्र कार्यालय में दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत था। बाद में शासन द्वारा उसे वन कर्मी के पद पर नियमित कर दिया गया। नियमितीकरण के पश्चात भी उसे मैदानी अथवा वन सुरक्षा से जुड़े कार्यों में न लगाकर कार्यालयीन बाबू का कार्य सौंप दिया गया, जो आज तक जारी है।
सूत्रों का कहना है कि यह वन कर्मचारी लंबे समय से कार्यालय में प्रभावशाली स्थिति में बना हुआ है। विभागीय नियमों के अनुसार वन कर्मियों से लिपिकीय कार्य कराना प्रतिबंधित है, इसके बावजूद वर्षों से फाइलों का संधारण, पत्राचार, रिकॉर्ड संधारण जैसे महत्वपूर्ण कार्य उसी के माध्यम से कराए जा रहे हैं। इससे अन्य कर्मचारियों में भी असंतोष की स्थिति बनी हुई है।
बताया जा रहा है कि उक्त वन कर्मी का विभाग में खासा दबदबा है। कई बार उसका स्थानांतरण भी किया गया, लेकिन हर बार उच्च अधिकारियों से मिलीभगत और कथित सांठगांठ के चलते वह पुनः नगरी कार्यालय में ही जमे रहने में सफल रहा। सूत्रों का यह भी आरोप है कि वर्तमान में पदस्थ अधिकारी भी उसके प्रभाव में कार्य कर रहे हैं और कई महत्वपूर्ण निर्णय उसके कहे अनुसार लिए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि एक ही व्यक्ति का इतने लंबे समय तक एक ही स्थान पर बने रहना विभागीय नीति और स्थानांतरण नियमों के विपरीत है। इससे न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होती है, बल्कि भ्रष्टाचार और मनमानी की आशंका भी बढ़ जाती है।
इस पूरे मामले को लेकर अब विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं। कर्मचारियों और स्थानीय लोगों की ओर से मांग की जा रही है कि संबंधित वन कर्मी को तत्काल नगरी वन परिक्षेत्र कार्यालय से हटाया जाए और उसके विरुद्ध विभागीय जांच कराई जाए। साथ ही यह भी मांग उठ रही है कि वर्षों से नियमों के विपरीत कराए जा रहे कार्यों की जिम्मेदारी तय की जाए और दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो। यदि समय रहते इस मामले में उच्च स्तर पर संज्ञान नहीं लिया गया, तो यह विभाग की साख और कार्यप्रणाली पर और भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। अब देखना यह है कि वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस प्रकरण पर क्या कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में नियमों के अनुरूप कार्रवाई हो पाती है या नहीं।










