
अजीत मिश्रा (खोजी)
🏞️बीडीओ की ‘मस्ती’ में जनता त्रस्त, नारों से प्यास बुझा रहा कप्तानगंज!🏞️
- ‘जल जीवन मिशन’ के दावों की खुली पोल; दीवारों पर स्लोगन चमके, हलक रहे सूखे।
- “खोखले निकले ‘हर घर जल’ के दावे: सांसद के RO हुए सफेद हाथी, बूंद-बूंद पानी को मोहताज हुए फरियादी”
- “पेंटिंग से प्यास नहीं बुझती साहब! भीषण गर्मी में कप्तानगंज ब्लॉक की संवेदनहीनता, प्यासी जनता का फूटा गुस्सा”
- “कप्तानगंज: बीडीओ की उदासीनता ने बुझाया प्याऊ का गला, कागजों पर चमक रहा जल मिशन”
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
बस्ती/कप्तानगंज। उत्तर प्रदेश सरकार जहाँ ‘हर घर जल’ और ‘राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन’ के जरिए विकास की नई इबारत लिखने का दावा कर रही है, वहीं बस्ती जिले का कप्तानगंज विकासखंड प्रशासनिक संवेदनहीनता का केंद्र बन गया है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच ब्लॉक मुख्यालय आने वाले फरियादी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। आलम यह है कि सरकारी दीवारों पर लिखे रंग-बिरंगे स्लोगन तो चमक रहे हैं, लेकिन उनके ठीक नीचे लगे प्याऊ दम तोड़ चुके हैं।
🔔सफेद हाथी बने आरओ प्लांट और हैंडपंप
विकासखंड परिसर में पूर्व सांसद निधि से जनता की सहूलियत के लिए लगवाए गए आरओ (RO) प्लांट और सरकारी हैंडपंप महीनों से खराब पड़े हैं। विडंबना देखिए कि जिस परिसर से पूरे ब्लॉक की विकास योजनाओं की रूपरेखा तय होती है, वही परिसर आज रेगिस्तान बना हुआ है। ब्लॉक में अपने काम के लिए आने वाले ग्रामीणों का कहना है कि— “साहब! दीवारों पर सजी पेंटिंग और सरकारी दावे प्यास नहीं बुझाते, हमें पानी चाहिए।”
🔔साहब की ‘नाक’ के नीचे कुप्रबंधन
हैरानी की बात यह है कि खंड विकास अधिकारी (BDO) के चेंबर से चंद कदमों की दूरी पर स्थित ये जल स्रोत मरम्मत के अभाव में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। ‘चेंबर-टू-चेंबर’ की राजनीति और फाइलों में मशगूल अधिकारियों की नजर इन खराब नलों पर क्यों नहीं पड़ती? यह एक बड़ा सवाल है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब ब्लॉक मुख्यालय की यह स्थिति है, तो गांवों में संचालित योजनाओं का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
🔔व्यवस्था की नाकामी
- दिखावटी विकास: जल जीवन मिशन के प्रचार-प्रसार पर लाखों खर्च, मगर धरातल पर प्याऊ खराब।
- उदासीन प्रशासन: शिकायतों के बावजूद मरम्मत कार्य के प्रति बीडीओ का ढुलमुल रवैया।
- फरियादियों की दुर्दशा: दूर-दराज से आने वाले बुजुर्ग और महिलाएं पानी के लिए निजी दुकानों पर निर्भर।
🎯बड़ा सवाल:
क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों को चमकाने और दीवारों पर पेंटिंग करवाने तक सीमित है? भीषण गर्मी में प्यासे होंठों को आखिर कब पानी मिलेगा या जनता इस ‘सरकारी कुप्रबंधन’ की प्यास में यूं ही जलती रहेगी?



















