

बलौदा बाजार।
जिले के प्रतिष्ठित हाई स्कूल पंडित चक्रपाढ़ी शुक्ला में रविवार को एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति सामने आई, जिसने प्रशासनिक संवेदनशीलता और प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। जिस परिसर में विद्यार्थियों का भविष्य तय करने वाली गौ माता आयोग की परीक्षा शांत वातावरण में संपन्न होनी थी, उसी समय स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा जोर-शोर से क्रिकेट मैच आयोजित किया गया।
स्थिति यह रही कि क्रिकेट मैच के दौरान माइक और लाउडस्पीकर पर लगातार ऊंची आवाज़ में अनाउंसमेंट और चिल्लाहट होती रही। परीक्षा केंद्र के ठीक आसपास इस शोरगुल ने छात्रों की एकाग्रता को बुरी तरह प्रभावित किया। परीक्षार्थी जहां प्रश्नपत्र हल करने में जुटे थे, वहीं माइक की तेज आवाज़ उनके मानसिक संतुलन और ध्यान भंग करने का कारण बनती रही।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि छात्रों और अभिभावकों की असुविधा के बावजूद माइक बंद नहीं किया गया। न तो आयोजकों ने शोर कम करने की कोशिश की, न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी ने हस्तक्षेप करना जरूरी समझा। ऐसा प्रतीत हुआ मानो परीक्षा से अधिक महत्व क्रिकेट मैच और उसकी घोषणा को दिया जा रहा हो।
यह घटना केवल शोर की नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और प्राथमिकता की गंभीर चूक को उजागर करती है। प्रश्न यह है कि—
क्या विद्यार्थियों का भविष्य, उनकी मेहनत और मानसिक शांति से ज्यादा जरूरी एक विभागीय क्रिकेट मैच है?
क्या परीक्षा जैसे संवेदनशील आयोजन के दौरान न्यूनतम शांति व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा के समय शोरगुल छात्रों में तनाव, घबराहट और एकाग्रता की कमी पैदा करता है, जिससे उनके प्रदर्शन पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में इस तरह की लापरवाही छात्रों के अधिकारों का हनन भी कही जा सकती है।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले, जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगे और भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्त व्यवस्था लागू करे।
क्योंकि सवाल केवल एक दिन की परीक्षा का नहीं,
सवाल है—क्या हमारी व्यवस्था में शिक्षा आज भी सर्वोच्च प्राथमिकता है या नहीं?












