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‘प्रधान एंड फैमिली’ का महाघोटाला: सूरापार में 4 करोड़ की सरकारी डकैती!

बनकटी ब्लॉक: भ्रष्टाचार की 'गंगोत्री' जहाँ बह रही है लूट की धारा।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨​’भ्रष्टाचार का गढ़’ बना बनकटी: विकास के नाम पर ‘प्रधान एंड फैमिली’ का खुला खेल🚨

🔥कागजों पर खोदे नाले, जेब में भरे करोड़ों: सूरापार की ‘लूट कथा’।

🔥प्रधानाचार्य की ‘सप्लायर’ वाली पहचान और करोड़ों का वारा-न्यारा!

🔥बीडीओ की ‘ममता’ या भ्रष्टाचार में ‘हिस्सेदारी’? जांच की आंच से बच रहे गुनहगार।

🔥4 साल, 100 शिकायतें, पर सूरापार के ‘लुटेरों’ पर मेहरबान है सिस्टम!

🔥GST की चोरी और मनरेगा में ‘बंदरबांट’—बनकटी ब्लॉक बना भ्रष्टाचार का टापू।

🔥सिंचाई विभाग कह रहा ‘नाला नहीं’, प्रधान ने निकाल लिए 70 लाख—अजब है यह खेल!

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। सरकारी धन की लूट अगर देखनी हो, तो बनकटी ब्लॉक के सूरापार आइए। यहाँ विकास के दावों के नीचे भ्रष्टाचार की ऐसी गहरी सुरंग खोदी गई है, जिसमें करोड़ों की रकम डकार ली गई। ‘खोरिया’ पंचायत के घाव अभी भरे नहीं थे कि सूरापार ने भ्रष्टाचार के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। यहाँ ‘प्रधान एंड फैमिली’ और ‘अफसरशाही’ के गठजोड़ ने लोकतंत्र के सबसे निचले स्तर को लूट का अड्डा बना दिया है।

​💫परिवारवाद और काली कमाई का संगम

​सूरापार की प्रधान मीरा देवी के रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक पुत्र सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य होते हुए भी ‘कंस्ट्रक्शन फर्म’ के मालिक बनकर सरकारी बजट को ठिकाने लगा रहे हैं। दूसरा पुत्र भी इसी खेल का हिस्सा है। आश्चर्य इस बात पर है कि करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने के बावजूद ये परिवार देसी शराब की दुकान चलाने से भी परहेज नहीं करता। पैसे की ऐसी भूख कि नियमों को ताक पर रखकर 4 करोड़ रुपये का मनरेगा घोटाला कर दिया गया।

​💫कागजों पर ‘नाला’ और ‘बंधा’, जेब में 70 लाख

​भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा देखिए—जिस ग्राम पंचायत में न कोई बंधा है और न ही कोई बड़ा नाला, वहां सिंचाई विभाग की रिपोर्ट के विपरीत मनरेगा के तहत ₹65 से ₹70 लाख सफाई और निर्माण के नाम पर निकाल लिए गए। कुल मिलाकर ₹3.42 करोड़ की रकम बिना कोई काम कराए डकार ली गई। विडंबना देखिए, जिस फर्म के माध्यम से भुगतान हुआ, उस पर ₹17 लाख की GST चोरी की रिकवरी भी बकाया है।

​💫बी़डीओ और विभाग की संदेहास्पद चुप्पी

​इस पूरे खेल में सबसे बड़ी भूमिका ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की है। आरोप है कि बीडीओ (BDO) और उनकी टीम न केवल भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दे रही है, बल्कि जांच टीमों को गुमराह कर रही है और अभिलेख उपलब्ध नहीं करा रही। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? पिछले चार साल से शिकायतकर्ता कमिश्नर और डीएम के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार की यह दीवार इतनी ऊंची है कि इसे पार करना मुश्किल हो रहा है।

💫​सवाल जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए:

  • ​एक सरकारी प्रधानाचार्य ‘सप्लायर फर्म’ का मालिक बनकर सरकारी ठेके कैसे ले सकता है?
  • ​बिना काम कराए करोड़ों का भुगतान करने वाले जिम्मेदारों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • ​क्या बनकटी ब्लॉक को भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बनाने वाले अधिकारियों को किसी ऊंचे रसूख का वरदहस्त प्राप्त है?
  • 📊 सूरापार घोटाले का ‘कच्चा चिट्ठा’
  • कुल अनुमानित घोटाला: लगभग ₹4 करोड़ (पिछले 5 वर्षों में)।
  • मनरेगा की लूट: कागजों पर बंधा और नाला दिखाकर ₹65 से ₹70 लाख की निकासी।
  • हैरतअंगेज खेल: सिंचाई विभाग की रिपोर्ट के अनुसार गांव में कोई ‘बंधा’ या ‘नाला’ है ही नहीं!
  • पहुंच वाला परिवार: प्रधान के पुत्र सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य भी हैं और निजी कंस्ट्रक्शन फर्म के मालिक भी।
  • GST की चोरी: घोटाले के पैसों से खड़ी फर्म पर ₹17 लाख की जीएसटी रिकवरी का आदेश।
  • बिना काम भुगतान: बिना कोई धरातलीय कार्य कराए कुल ₹3.42 करोड़ का सरकारी धन डकारा गया।
  • जांच में बाधा: आरोप है कि बीडीओ (BDO) और ब्लॉक कार्यालय न तो रिकॉर्ड दे रहे हैं और न ही जांच में सहयोग कर रहे।

💫सवाल यह है कि:

👉एक सरकारी शिक्षक ‘सप्लायर’ बनकर खुद की फर्म को करोड़ों के ठेके कैसे दे सकता है? क्या शिक्षा विभाग और विकास विभाग की आंखें मूंद ली गई थीं?

👉जिस गांव में ‘नाला’ और ‘बंधा’ भौतिक रूप से मौजूद ही नहीं, वहां सत्तर लाख रुपये का भुगतान फाइलों में कैसे ‘पास’ हो गया? क्या जांच अधिकारी केवल दफ्तर में बैठकर कागजों पर मुहर लगा रहे थे?

👉भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों (BDO, JE) का जांच में सहयोग न करना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ‘दाल’ ही नहीं, पूरी ‘हांडी’ काली है।

हमारा नजरिया: मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का मखौल उड़ाने वाले ऐसे सफेदपोशों पर केवल कागजी जांच नहीं, बल्कि रिकवरी और जेल जैसी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि करोड़ों रुपये डकारने वाले ‘प्रधान एंड फैमिली’ और उनके मददगार अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा गया, तो विकास की हर योजना भ्रष्टाचार की इसी भेंट चढ़ती रहेगी।

सूरापार की यह कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो जनता के टैक्स के पैसे को ‘बंदरबांट’ करने के लिए बना है। यदि जल्द ही इस पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो शासन की “जीरो टॉलरेंस” की नीति महज एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगी।

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