
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती के बिजली विभाग में ‘गायब’ हुए उपकरण: क्या फाइलों में ही दफन हो जाएगा करोड़ों का घोटाला?
उत्तर प्रदेश।।
बस्ती ।। क्या सरकारी तंत्र में ‘गायब’ होने का खेल अब एक परंपरा बन चुका है? बस्ती के मीटर परीक्षण खंड से सामने आई खबर इस सवाल को और गहरा कर देती है। जिस विभाग का काम बिजली आपूर्ति सुचारू रखना था, वहां अब फाइलों और स्टोर के तालों के पीछे ‘करोड़ों के घोटाले’ की बदबू आ रही है।
💫तालों के पीछे का सच या सिर्फ खानापूर्ति?
लंबे समय से यह जांच इसलिए ठंडी पड़ी थी क्योंकि संबंधित जूनियर इंजीनियर (JE) नदारद थे। तर्क यह दिया गया कि “उनके बिना ताला नहीं खुल सकता।” यह सुनकर हैरानी होती है कि क्या एक सरकारी स्टोर का नियंत्रण मात्र एक व्यक्ति की जेब में था? अब, जब ताला खुल चुका है और स्टॉक मिलान की प्रक्रिया शुरू हुई है, तो बड़ा सवाल यह है कि—क्या यह जांच किसी नतीजे तक पहुंचेगी, या फिर यह भी पुरानी फाइलों की तरह धूल फांकती रहेगी?
💫विवाद, मारपीट और सवालों के घेरे में अधिकारी
यह मामला सिर्फ उपकरणों के गायब होने का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक अराजकता का भी है। अधीशासी अभियंता और एक JE के बीच हुई मारपीट की घटना बताती है कि विभाग के भीतर सब कुछ कितना ‘खोखला’ है। जब आला अधिकारियों के बीच तनातनी हो, तो स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार को फलने-फूलने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है।
💫अंतिम चेतावनी: जनता के पैसों का हिसाब कौन देगा?
उपकरणों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? सीटी, पीटी, रिले और ट्रिप कार्ड जैसे महंगे उपकरण गायब हुए हैं, जो सीधे जनता के टैक्स के पैसों से खरीदे गए थे।
👉साठगांठ का अंदेशा: जांच में जिस तरह की देरी बरती गई है, वह किसी बड़ी मिलीभगत की ओर इशारा करती है। कहीं यह जांच केवल दोषियों को बचाने का एक व्यवस्थित तरीका तो नहीं?
अगर प्रशासन और शासन ने इस मामले में सख्त रुख नहीं अपनाया और केवल एक-दो छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामला शांत कर दिया, तो यह बस्ती की जनता के साथ बड़ा धोखा होगा।
सवाल जनता का है—क्या यह जांच ‘सच’ को बाहर लाएगी, या फिर यह ‘घोटाले की कलंक कथा’ केवल अखबारों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगी?





















