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बस्ती जिला अस्पताल: जहाँ जिंदगी हार रही है और सिस्टम सो रहा है!

मौत का इंतजार या प्रशासनिक लाचारी? 10 दिन से रेबीज वैक्सीन नदारद!

अजीत मिश्रा (खोजी)

🎯बस्ती: सरकारी सिस्टम को ‘रेबीज’ या मासूमों की जान का सौदा?🎯

  • 10 दिन से ‘संजीवनी’ का अकाल, अस्पताल प्रशासन की चुप्पी और आम जनता का बेबस रुदन
  • गरीबों की जान पर भारी ‘साहब’ की सुस्ती: वैक्सीन नहीं, सिर्फ बहाने मिल रहे हैं।
  • कागजी ‘डिमांड’ और धरातल पर ‘सन्नाटा’: स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा।
  • मिशन 2026 या विजन जीरो? जिला अस्पताल में तड़पते मरीज, खाली पड़े फ्रिज।
  • रेबीज का डर और प्रशासन का बेपरवाह चेहरा: आखिर जिम्मेदार कौन?

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

बस्ती। प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के दावों की पोल एक बार फिर बस्ती जिला अस्पताल में खुल गई है। यहाँ पिछले 10 दिनों से एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) खत्म है। यह महज एक दवा की कमी नहीं, बल्कि उन गरीब और लाचार मरीजों के जीवन के साथ किया जा रहा ‘सिस्टम’ का क्रूर मजाक है, जो कुत्ते या बंदर के काटने के बाद मौत के खौफ में अस्पताल की दहलीज पर आते हैं, लेकिन उन्हें वहां से सिर्फ ‘उम्मीद’ नहीं, बल्कि ‘दुत्कार’ और ‘नाकामी’ का पर्चा थमाकर वापस भेज दिया जाता है।

🎯कुर्सी की ‘ठंडक’ और जनता की ‘तपन’

विचित्र विडंबना देखिए कि अस्पताल प्रशासन को 10 दिन बीत जाने के बाद भी यह समझ नहीं आ रहा कि ‘डिमांड’ भेजने और ‘सप्लाई’ आने के बीच जो वक्त बीत रहा है, वह किसी की जान की आखिरी घड़ी हो सकता है। रेबीज एक ऐसी घातक बीमारी है जिसका संक्रमण फैलने के बाद दुनिया का कोई डॉक्टर मरीज को नहीं बचा सकता। ऐसे में 24 घंटे के भीतर लगने वाला इंजेक्शन यदि 10 दिन तक न मिले, तो क्या स्वास्थ्य विभाग इसे ‘प्रक्रियात्मक देरी’ कहकर अपना पल्ला झाड़ सकता है? यह देरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक हत्या की तैयारी है।

🎯प्राइवेट अस्पतालों की चांदी, गरीबों की जेब पर डाका

अस्पताल में वैक्सीन न होने का सीधा फायदा निजी अस्पतालों और दवा माफियाओं को मिल रहा है। जो इंजेक्शन सरकारी अस्पताल में मुफ्त मिलना चाहिए, उसे बाहर के मेडिकल स्टोर पर ऊंचे दामों में खरीदने के लिए गरीब मजबूर हैं। सवाल यह है कि क्या यह किल्लत जानबूझकर पैदा की गई है? क्या सिस्टम की सुस्ती निजी मेडिकल स्टोर्स की तिजोरियां भरने के लिए है? करीब 250 से अधिक मरीज अब तक बिना वैक्सीन लगवाए वापस जा चुके हैं। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अब किसकी है?

🎯जुमलों की ‘वैक्सीन’ से नहीं मिटेगा संक्रमण

अस्पताल प्रशासन के पास रटा-रटाया जवाब है— “डिमांड भेजी गई है, जल्द आ जाएगी।” सवाल यह है कि जब स्टॉक खत्म हो रहा था, तब ‘डिमांड’ क्यों नहीं भेजी गई? क्या प्रशासन को यह नहीं पता था कि बस्ती जैसे जिले में आवारा कुत्तों और बंदरों का आतंक किस कदर है? जिला अस्पताल के अधिकारियों की यह घोर लापरवाही मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों पर करारा तमाचा है।

🎯अंतिम चेतावनी और सवाल

बस्ती मंडल की जनता पूछती है:

👉अगर इन 10 दिनों के दौरान किसी पीड़ित में रेबीज के लक्षण विकसित हो जाते हैं, तो क्या सीएमओ या अस्पताल अधीक्षक इसकी जिम्मेदारी लेंगे?

👉क्या कागजी डिमांड भेजना ही प्रशासन का अंतिम कर्तव्य है? आपूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए शासन स्तर पर पैरवी क्यों नहीं की गई?

👉क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?

✍️ स्वास्थ्य विभाग की यह संवेदनहीनता अब बर्दाश्त के बाहर है। यदि अगले 24 घंटों के भीतर वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह माना जाएगा कि बस्ती का स्वास्थ्य विभाग आम जनमानस के जीवन की रक्षा करने में पूरी तरह अक्षम है। साहब! फाइलों की धूल झाड़िए, क्योंकि जनता का सब्र अब टूट रहा है।

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