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बस्ती में खाकी-खादी और माफिया का ‘त्रिदेव’: किसके संरक्षण में लुट रही धरती मां की कोख?”

।। खनन माफियाओं को न तो पुलिस का खौफ है और न ही प्रशासन का।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में खाकी-खादी और माफिया का ‘त्रिदेव’: किसके संरक्षण में लुट रही धरती मां की कोख?”

01 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जनपद में कानून का इकबाल किस कदर बुलंद है, इसकी बानगी गनेशपुर के मोती सिराघाट पर साफ देखी जा सकती है। यहाँ शासन के नियम और एनजीटी (NGT) की गाइडलाइंस को जेसीबी की बाल्टियों में भरकर गहरे गड्ढों में दफन किया जा रहा है। ‘अर्श ईंट भट्टे’ के इर्द-गिर्द रात के सन्नाटे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में दहाड़ती जेसीबी मशीनें इस बात का प्रमाण हैं कि खनन माफियाओं को न तो पुलिस का खौफ है और न ही प्रशासन का।

🔥 जिम्मेदार ‘गांधारी’ बने, माफिया की ‘चांदी’।

हैरानी की बात यह है कि सोशल मीडिया पर अवैध खनन के वीडियो वायरल होने के बावजूद खनन विभाग और स्थानीय पुलिस ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका में हैं। ग्रामीण चिल्ला रहे हैं, शिकायतें दफ्तरों की धूल फांक रही हैं, लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या खनन विभाग के अधिकारियों की जेबें माफियाओं की ‘मिट्टी’ से भर गई हैं? आखिर क्या वजह है कि जब ग्रामीण एसडीएम और थाने को फोन करते हैं, तो कार्रवाई के बजाय माफिया को भागने का मौका मिल जाता है?

🔥 खनन अधिकारी के ‘मूक’ आशीर्वाद का खेल।

सूत्रों की मानें तो यह पूरा खेल बिना ‘ऊपर’ की सेटिंग के मुमकिन नहीं है। जनपद में खनन अधिकारी की भूमिका हमेशा से संदिग्ध रही है। रसीद किसी और खेत की, खुदाई कहीं और, और गहराई मानकों से चार गुना ज्यादा—यही यहाँ का नया दस्तूर बन चुका है। गनेशपुर का अर्श भट्टा तो महज एक नजीर है, पूरे जनपद में कई जगहों पर ‘काली कमाई’ का यह पीला पंजा बेखौफ चल रहा है।

सड़कें बदहाल, प्रशासन मालामाल!

मिट्टी लदे ओवरलोड ट्रैक्टरों ने ग्रामीण सड़कों का सीना छलनी कर दिया है। धूल के गुबार से स्थानीय लोगों का जीना मुहाल है, लेकिन खनन विभाग के लिए यह सिर्फ ‘आंकड़ों’ और ‘नजराने’ का खेल है। जनता सवाल पूछ रही है कि जब मुख्यमंत्री जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं, तो बस्ती के अधिकारी माफियाओं को ‘स्पेशल प्रोटेक्शन’ क्यों दे रहे हैं?

अगर समय रहते इस ‘मिट्टी के खेल’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्ती की उपजाऊ जमीन सिर्फ माफियाओं के बैंक बैलेंस बढ़ाने का जरिया बनकर रह जाएगी। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी इस वायरल वीडियो और जनता के आक्रोश पर कब ‘चाबुक’ चलाते हैं या फिर यह मामला भी पुरानी शिकायतों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा।

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