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बस्ती में वन विभाग का ‘खेला’: थाल्हापार में महुआ के पेड़ों पर चली कुल्हाड़ी, डीएफओ की चुप्पी ने खड़े किए सवाल!

पर्यावरण संरक्षण का 'ढोल' या भ्रष्टाचार का 'झोल'? डीएफओ बस्ती की 'ना-नुकूर' से कटघरे में विभाग।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। पर्यावरण के ‘रक्षक’ ही बने ‘भक्षक’: थाल्हापार में महुआ के प्रतिबंधित पेड़ों पर चली कुल्हाड़ी, डीएफओ की चुप्पी ने खड़े किए सवाल।।

उत्तर प्रदेश 

बस्ती। प्रदेश सरकार एक ओर ‘वृक्षारोपण जन अभियान’ चलाकर करोड़ों पौधे रोपने का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी ओर बस्ती जनपद के जिम्मेदार अधिकारी ही सरकारी मंशा को पलीता लगाने में जुटे हैं। ताजा मामला लालगंज थाना क्षेत्र के थाल्हापार का है, जहाँ वन विभाग और लकड़ी माफियाओं की जुगलबंदी ने प्रतिबंधित महुआ के पेड़ों का अस्तित्व मिटा दिया। हैरानी की बात यह है कि सूचना मिलने के बाद भी डीएफओ जैसे जिम्मेदार अधिकारी की ‘ना-नुकूर’ भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर साफ इशारा कर रही है।

विभाग ने साधी चुप्पी

थाल्हापार में हुए इस अवैध कटान की खबर जंगल की आग की तरह फैली। जब जनता के माध्यम से विभाग को भनक लगी, तो कार्रवाई करने के बजाय जिम्मेदारों ने कथित तौर पर ‘धनादोहन’ का अवसर तलाशना शुरू कर दिया। सूत्रों की मानें तो तीन-चार दिनों तक मामले को दबाए रखा गया और मौका मिलते ही लकड़ी को मौके से गायब करवा दिया गया।

डीएफओ की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल

जब मीडिया की टीमों ने साक्ष्यों के साथ जिला स्तरीय अधिकारियों का घेराव किया, तो डीएफओ बस्ती अपनी जिम्मेदारी से बचती और साक्ष्य छुपाती नजर आईं। हद तो तब हो गई जब घटना के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी डीएफओ अपने अधीनस्थों से कार्रवाई की रिपोर्ट तक नहीं ले सकीं। विभाग की यह सुस्ती स्पष्ट करती है कि मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि ‘लीपापोती’ के खेल का है।

“जब रक्षक ही मौन हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण की बात करना बेमानी है। थाल्हापार की घटना ने वन विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।”

मुख्य बिंदु: जो जांच का विषय हैं

प्रतिबंधित पेड़ों की कटान: बिना अनुमति महुआ जैसे प्रतिबंधित पेड़ों पर कुल्हाड़ी कैसे चली?

साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़: वीडियो वायरल होने के बाद भी लकड़ी को मौके से क्यों और किसके आदेश पर हटवाया गया?

अधिकारियों की टालमटोल: डीएफओ द्वारा रिपोर्ट मंगवाने में देरी करना क्या दोषियों को बचाने की साजिश है?

खबर लिखे जाने तक वन विभाग की टीम किसी ठोस नतीजे पर पहुँचने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डालने की जुगत में लगी रही। अब देखना यह है कि क्या शासन स्तर से इन लापरवाह अधिकारियों पर कोई गाज गिरती है या फिर इसी तरह ‘कागजी हरियाली’ के बीच बस्ती का पर्यावरण लुटता रहेगा।

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