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‘लिखित शिकायत’ का इंतजार करती मौतें: क्या भानपुर सीएचसी में डॉक्टर केवल फाइलों में हैं?

सरकारी अस्पताल या मौत का अड्डा? बिजली कटी, ऑक्सीजन बंद और बुजुर्ग की जान गई!

अजीत मिश्रा (खोजी)

स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली: क्या सरकारी अस्पतालों में जान की कोई कीमत नहीं?

बस्ती, उत्तर प्रदेश।

भानपुर सीएचसी (CHC) की घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था और संवेदनहीनता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक 70 वर्षीय बुजुर्ग की मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि सरकारी तंत्र के उस खोखले दावों की पोल भी खोल दी, जिसमें मरीजों को “बेहतर और तत्पर उपचार” देने की बात कही जाती है।

जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता प्रशासन

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा था, तब भी जिम्मेदार अधिकारी रटा-रटाया जवाब दे रहे थे—”हमें कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है।” क्या अस्पताल प्रशासन और स्थानीय पुलिस की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे खुद घटना का संज्ञान लें? यह कैसी व्यवस्था है जहाँ एक मरीज की मौत हो जाती है, अस्पताल में हंगामा होता है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजी शिकायतों का इंतजार करते रहते हैं?

व्यवस्था के नाम पर खिलवाड़

परिजनों का आरोप है कि रात के समय कोई डॉक्टर ड्यूटी पर मौजूद नहीं था। केवल एक स्टाफ नर्स के भरोसे गंभीर मरीजों को छोड़ देना, क्या यह लापरवाही की पराकाष्ठा नहीं है? बिजली कटते ही ऑक्सीजन मशीन का बंद हो जाना और उसे दोबारा चालू न करना, सीधे तौर पर ‘हत्या’ जैसी लापरवाही की श्रेणी में आता है। यदि सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में ही बुनियादी सुविधाएं और डॉक्टर नहीं हैं, तो इन्हें खोलने का औचित्य ही क्या है?

सुध कौन लेगा?

एक तरफ भानपुर की घटना है, तो दूसरी तरफ बस्ती के ही एक प्राइवेट अस्पताल में प्रसूता की मौत का मामला है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण मजबूरन लोग प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करते हैं, जहाँ वे लूट और गलत इलाज के शिकार होते हैं।

क्या हमारा स्वास्थ्य तंत्र अब केवल मौत के आंकड़ों को दर्ज करने वाला एक क्लर्क बनकर रह गया है? जब तक ऐसे मामलों में दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी और ‘लिखित शिकायत’ की आड़ में लीपापोती होती रहेगी, तब तक सरकारी अस्पताल मरीजों के लिए ‘आस्था के केंद्र’ नहीं, बल्कि ‘अकाल मृत्यु के अड्डे’ ही बने रहेंगे।

अब समय आ गया है कि जनता केवल सड़कों पर हंगामा न करे, बल्कि इस खोखली व्यवस्था के खिलाफ एक सामूहिक ‘चेतावनी’ दे। आखिर जान सबकी कीमती है, और उसे ‘लापरवाही’ की भेंट चढ़ते देखना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

प्रश्न यह है: क्या स्वास्थ्य विभाग केवल ‘लिखित शिकायत’ का इंतजार करता रहेगा, या किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद की जा सकती है?

बिजली गई, जान गई: कौन सा युग है ये?

इक्कीसवीं सदी के भारत में, भानपुर सीएचसी में बिजली कटते ही ऑक्सीजन मशीन का दम तोड़ देना किसी डरावनी फिल्म जैसा लगता है। एक स्टाफ नर्स के कंधों पर पूरे अस्पताल का भार डाल देना और डॉक्टरों का वहां नदारद रहना—यह इलाज नहीं, बल्कि एक ‘खतरनाक जुआ’ है। और सबसे बड़ा मजाक यह कि व्यवस्था इसे ‘घटना’ मानकर जांच की बात करती है, जबकि हकीकत में यह प्रशासन की आपराधिक उदासीनता है।

सवालों के घेरे में ‘सिस्टम’:

डॉक्टर कहाँ थे? क्या सरकारी डॉक्टरों के लिए ड्यूटी का मतलब केवल उपस्थिति दर्ज करना है, न कि मरीजों की सेवा करना?

शिकायत का इंतजार क्यों? क्या एक बुजुर्ग की मौत का शोर जिम्मेदार अधिकारियों के कानों तक नहीं पहुँचा? या फिर संवेदनशीलता भी अब ‘लिखित आवेदन’ के बिना जागृत नहीं होती?

प्राइवेट का जाल: सरकारी अस्पतालों का ऐसा ‘दमघोंटू’ स्वरूप ही तो आम आदमी को प्राइवेट अस्पतालों की लूटपाट के लिए मजबूर करता है, जहाँ प्रसूताओं की जान तक सुरक्षित नहीं

निष्कर्ष: जब तक ऐसे मामलों में जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषी डॉक्टरों या कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सरकारी अस्पताल मरीजों के लिए ‘जीवन देने वाले केंद्र’ के बजाय ‘अंतिम विश्राम स्थल’ ही बने रहेंगे।

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