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वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे—लोकसभा में विशेष सत्र, PM मोदी करेंगे चर्चा की शुरुआत

वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज
✒️ विस्तृत विशेष समाचार रिपोर्ट

नई दिल्ली। भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना को 150 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर सोमवार को लोकसभा में एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। इस विशेष सत्र में 10 घंटे तक व्यापक चर्चा प्रस्तावित है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जाएगी।
यह अवसर केवल गीत की रचना का स्मरण नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति की भावना में इसकी भूमिका को सम्मान देने का भी है।

🔹 राष्ट्रीय गीत का गौरवशाली इतिहास

भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ सन 1950 में संविधान सभा द्वारा आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इस गीत की रचना प्रख्यात साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी।

यह गीत बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल है।

लेकिन रचना इससे पहले हो चुकी थी और

पहली बार 7 नवंबर 1875 को यह गीत उनके संपादन में प्रकाशित बंगाली मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में छपा था।

इस गीत ने वर्षों तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को ऊर्जा और अदम्य साहस देने का काम किया।

🔹 विदेश में पहली बार गूँजा ‘वंदे मातरम्’

1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में पहली बार भारत के बाहर तिरंगा झंडा फहराया।
उस झंडे पर ‘वंदे मातरम्’ अक्षरों में अंकित था।
यह क्षण विदेशों में भारत की पहचान और राष्ट्रवादी चेतना का ऐतिहासिक प्रतीक बना।

🔹 पहली बार किसने गाया राष्ट्रीय गीत?

1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इस गीत को स्वर प्रदान किया।
उन्होंने इसे संगीतबद्ध भी किया।
उनकी आवाज़ में ‘वंदे मातरम्’ उस समय स्वतंत्रता आंदोलन का भावनात्मक संचारक बन गया।

🔹 राजनीतिक नारा बना वंदे मातरम्

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत केवल सांस्कृतिक रचना नहीं रहा—
यह जन-आंदोलन की आवाज बन गया।

7 अगस्त 1905 को वंदे मातरम् पहली बार एक राजनीतिक नारे के रूप में उपयोग हुआ।

1906 में बिपिनचंद्र पाल के संपादन में अंग्रेजी दैनिक ‘Bande Mataram’ शुरू हुआ।

बाद में श्री अरबिंदो इसके संयुक्त संपादक बने।
इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों की एकता और शक्ति को शब्द दिए।

🔸 वंदे मातरम्—अर्थ और भाव

मूल पंक्तियाँ :

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!

सरल अर्थ :

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ—
तुम जल से भरपूर, फलों और फसलों से समृद्ध,
शीतल, सुगंधित हवाओं से सुशोभित,
हरी-भरी खेती से लहलहाती पावन भूमि हो।
हे माँ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।

दूसरा स्तोत्र :

शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम्, मातरम्!

सरल अर्थ :

वो धरती जिसकी रातें चांदनी से चमकती हैं,
जो खिले फूलों और पेड़ों से सुसज्जित है,
जो मुस्कुराती है, मधुर भाषा बोलती है,
जो सुख देती है, वरदान देती है—
हे भारत माता, तुम्हें मेरा प्रणाम।

📌 निष्कर्ष

वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं—
यह भारत की आत्मा का स्वर,
स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक मंत्र,
और भारतीय संस्कृति का गौरवशाली प्रतीक है।

150 वर्ष पूरे होने पर आयोजित यह विशेष सत्र भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभक्ति के भाव को एक बार फिर प्रखर करता है।

वंदे मातरम्! 🇮🇳

Jitendra Maurya

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