
बिस्वाजीत दास
कांकेर /पखांजूर
सिस्टम फेल, जनता पास
मदद को नहीं आए हाथ, तो ग्रामीणों ने खुद थाम ली ‘फावड़े-कुदाल’….. आज प्रशासन की उदासीनता और खोखले दावों की पोल उस वक्त खुल गई, जब बदहाल सड़क के गड्ढों से तंग आकर ग्रामीणों ने खुद ही सड़क मरम्मत का जिम्मा उठा लिया।प्रशासनिक अनदेखी: महीनों से जर्जर सड़क और जानलेवा गड्ढों की शिकायत के बावजूद विभाग ने नहीं ली सुध।
जन-भागीदारी का उदाहरण: ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर निर्माण सामग्री मंगवाई और खुद ही श्रमदान शुरू किया।
हादसों को दावत: इस सड़क पर आए दिन राहगीर चोटिल हो रहे थे, जिससे आक्रोश चरम पर था।साहब की गाड़ी नहीं रुकती, हमारा चलना दूभर”
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार लिखित आवेदन दिया, लेकिन फाइलों के बोझ तले जनता की आवाज दब गई। “जब सरकार सो रही हो, तो हमें खुद जागना पड़ता है,” यह शब्द उन ग्रामीणों के हैं जो चिलचिलाती धूप में सड़क सुधारने में जुटे हैं।बड़ा सवाल: क्या टैक्स भरने वाली जनता को अब अपनी सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए भी खुद ही पसीना बहाना पड़ेगा? प्रशासन का यह ‘मौन’ विकास के दावों पर करारा तमाचा है।सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल
ग्रामीणों के इस ‘शान प्रदर्शन’ और काम करते हुए वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे विभाग की काफी किरकिरी हो रही है। अब देखना यह है कि जनता के इस कड़े रुख के बाद क्या प्रशासन की नींद टूटती है?










