इतवाउत्तर प्रदेशकुशीनगरगोंडागोरखपुरबस्तीबहराइचलखनऊसिद्धार्थनगर 

96 लाख का ‘खेल’, जांच बनी ‘जेल’: मातृ वंदना योजना के दोषियों को कौन बचा रहा है?

सरकारी खजाने में 'सेंधमारी', प्रशासन की खामोशी जारी: तीन महीने बाद भी नतीजा सिफर!

अजीत मिश्रा (खोजी)

प्रशासनिक सुस्ती और घोटालों की भेंट चढ़ता जन-कल्याण: कौन बचा रहा है ‘रकम चोरों’ को?

बस्ती: प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसे संवेदनशील जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों में 96 लाख रुपये का घोटाला महज एक वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि यह उन गरीब माताओं के भरोसे के साथ खिलवाड़ है, जिन्हें इस राशि की सबसे अधिक आवश्यकता थी।

​घटना को तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन जांच अभी भी ‘अंतिम चरण’ का बहाना बनाकर फाइलों में दबी हुई है। यह सवाल उठाना लाजिमी है कि आखिर इस सुस्ती के पीछे कौन सी ताकतें हैं?

​व्यवस्था की विफलता: तीन महीने, शून्य परिणाम

​जब रुधौली ब्लॉक में 1700 से अधिक फर्जी खातों में सरकारी पैसा पहुँचाया गया, तो यह स्पष्ट था कि यह बिना मिलीभगत के संभव नहीं है। लेकिन तीन महीने की सुस्त जांच ने प्रशासन की मंशा पर संदेह के बादल खड़े कर दिए हैं।

  • जांच में देरी क्यों? क्या तीन महीने का समय रिकॉर्ड खंगालने के लिए पर्याप्त नहीं था?
  • असली पीड़ित दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर: एक तरफ ‘रकम चोर’ आराम कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक लाभार्थी अपनी पात्रता साबित करने के लिए विभागों के चक्कर काट रहे हैं।
  • उत्तरदायित्व का अभाव: सीटीओ, जिला सूचना विज्ञान अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने में यह देरी किसे बचाने की कोशिश है?

​’सिस्टम’ का ढीलापन ही भ्रष्टाचार की खाद

​किसी भी सरकारी योजना में इतना बड़ा सेंध लगाना यह साबित करता है कि आंतरिक नियंत्रण (internal control) पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। यदि जांच इसी गति से चलती रही, तो न केवल साक्ष्य मिटा दिए जाएंगे, बल्कि भ्रष्टाचारियों के हौसले भी बुलंद होते रहेंगे।

​प्रशासन को यह समझना होगा कि जांच में देरी केवल समय की बर्बादी नहीं है, यह जनता के कर (tax) के पैसे का अपमान है।

​अब क्या?

​डीएम द्वारा गठित समिति को अब अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। जनता को यह जानने का हक है कि:

  1. ​उन 96 लाख रुपयों का अंतिम ठिकाना क्या था?
  2. ​उन अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी जिनकी देखरेख में यह घोटाला हुआ?
  3. ​असली लाभार्थियों का पैसा उन्हें कब तक मिलेगा?

​भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा कागजों पर नहीं, बल्कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई में दिखना चाहिए। यदि इस मामले में तुरंत ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक विफलता का एक ऐसा काला अध्याय बन जाएगा, जिसे भविष्य में कभी नहीं भुलाया जा सकेगा।

Back to top button
error: Content is protected !!