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गढ़हा गौतम का ‘बंधक’ बचपन: दबंगों ने रोका रास्ता, स्कूल जाने से महरूम हुए मासूम।

सीएम पोर्टल फेल, अब डीएम से आस; क्या रसूखदार हेडमास्टर के आगे झुका तंत्र?

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। दबंगई की ‘दीवार’ के पीछे कैद हुआ बचपन और भविष्य: गढ़ा गौतम गांव में लोकतंत्र शर्मसार।।

बुधवार 21 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। प्रदेश में एक तरफ जहां ‘जीरो टॉलरेंस’ और कानून के राज का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं जिले के कप्तानगंज थाना क्षेत्र का गढ़ा गौतम गांव सामंती सोच और दबंगई की जीती-जागती मिसाल बन गया है। यहां रसूख के नशे में चूर दबंगों ने न केवल सरकारी जमीनों को अपनी जागीर बना लिया, बल्कि अनुसूचित जाति के दर्जनों परिवारों का रास्ता बंद कर उन्हें उनके ही घरों में ‘कैद’ कर दिया है।

💫रसूख का ‘अतिक्रमण’ और बेबस प्रशासन

आरोप है कि गांव के ही चंद्रमोहन यादव, रजनीश, फौजदार और मदन मोहन यादव ने नवीन परती, ताल-पोखरों और हरिजन आबादी की जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। हद तो तब हो गई जब वर्षों से इस्तेमाल हो रहे रास्ते पर लोहे का गेट जड़ दिया गया। यह उस समाज की कड़वी हकीकत है जहां एक स्कूल का हेडमास्टर—जिसका काम बच्चों को सही रास्ता दिखाना है—वही आज मासूमों के स्कूल जाने का रास्ता रोक कर खड़ा है।

💫समझौते की बलि चढ़ी इंसानियत

ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में हुए समझौतों को ताक पर रखकर दबंगों ने तानाशाही रवैया अपना लिया है। स्थिति इतनी नारकीय हो गई है कि लोग एक-दूसरे की छतों और कमरों से होकर गुजरने को मजबूर हैं। सबसे डरावना पहलू यह है कि शिकायत करने पर इन पीड़ितों को न्याय के बजाय ‘जान से मारने की धमकी’ मिलती है।

💫क्या आत्मदाह के बाद जागेगा तंत्र?

पीड़ित जितेंद्र कुमार का यह बयान कि “अपमानजनक जीवन जीने से अच्छा पेट्रोल डालकर खुदकुशी कर लेना है”, जिला प्रशासन के मुंह पर करारा तमाचा है। सवाल यह उठता है कि:

🔥क्या सरकारी पोर्टल (IGRS) की शिकायतें सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए हैं?

🔥एक प्रभावशाली सरकारी कर्मचारी (हेडमास्टर) नियम-कानूनों से ऊपर कैसे हो गया?

🔥क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?

💫डीएम से आखिरी उम्मीद

फिलहाल, पीड़ितों ने जिलाधिकारी से न्याय की गुहार लगाई है। डीएम ने आश्वासन तो दिया है, लेकिन क्या यह आश्वासन जमीन पर उतरेगा या फिर दबंगों का रसूख एक बार फिर गरीब की आवाज को दबा देगा? गढ़ा गौतम के लोग आज अपने घरों में नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता के पिंजरे में बंद हैं। यदि समय रहते रास्ता बहाल नहीं हुआ और अतिक्रमण नहीं हटा, तो यह आक्रोश किसी बड़े आंदोलन या अनहोनी का रूप ले सकता है।

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