
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। गणतंत्र का अपमान: जब राष्ट्रीय पर्व पर ‘कागजी भूतों’ ने खोदी मनरेगा की खाई।।
मंगलवार 27 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती। जहाँ एक ओर पूरा देश 26 जनवरी को गणतंत्र की मजबूती का जश्न मना रहा था, वहीं बस्ती जिले के भ्रष्ट तंत्र ने संविधान की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विडंबना देखिए, जिस दिन सरकारी दफ्तरों से लेकर स्कूलों तक में तिरंगा फहराया जा रहा था, उसी राष्ट्रीय अवकाश के दिन जिले के हजारों ‘कागजी मजदूर’ फावड़ा चला रहे थे। हकीकत में जमीन पर सन्नाटा था, लेकिन भ्रष्टाचार के डिजिटल पोर्टल पर हाजिरी फुल थी। यह महज घोटाला नहीं, राष्ट्रीय पर्व और नियमों का खुला मजाक है।
कुदरहा बना ‘महाघोटाले’ का केंद्र
जिले में भ्रष्टाचार का सबसे नग्न स्वरूप कुदरहा ब्लॉक में देखने को मिला। यहाँ फर्जीवाड़े की हद पार करते हुए एक ही फोटो को तीन अलग-अलग कामों में अपलोड कर दिया गया। कुदरहा के मंझरिया में 123, कुबेरपुर में 85 और बैरारी एहतमाली में 26 मजदूरों की फर्जी हाजिरी भरकर सरकारी खजाने पर डाका डालने की पूरी पटकथा तैयार कर ली गई। सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी अंधे हो चुके हैं या उनकी जेबें इस फर्जीवाड़े से गरम हैं?
ब्लॉक दर ब्लॉक भ्रष्टाचार का ‘खूनी खेल’
सिर्फ कुदरहा ही नहीं, पूरे जिले की गंगा में भ्रष्टाचार की धार बह रही है:
सदर ब्लॉक: यहाँ 54 मजदूरों की फर्जी हाजिरी दर्ज हुई। सिस्टम मौन रहकर इस लूट को अपनी मूक सहमति दे रहा है।
दुबौलिया (सरया अतिबल): रिकॉर्ड में 51 नाम दर्ज हैं, पर मौके पर काम ‘शून्य’ है। भुगतान की फाइलें सरपट दौड़ रही हैं।
परशुरामपुर और रामनगर: यहाँ क्रमशः 120 और 35 मजदूरों के नाम रजिस्टर में तो चिल्ला रहे हैं, लेकिन जमीन खामोश है।
बहादुरपुर: यहाँ कागजों में 10 मजदूर दिखाए गए, लेकिन धरातल पर एक भी इंसान पसीना बहाता नहीं दिखा।
साऊघाट और विक्रमजोत: राष्ट्रीय पर्व पर भी यहाँ खेल जारी रहा, जहाँ क्रमशः 24 और 45 मजदूरों की फर्जी हाजिरी दर्ज की गई।
तकनीक को बनाया लूट का हथियार
मनरेगा में पारदर्शिता के लिए लाई गई एनएमएमएस (NMMS) व्यवस्था को यहाँ के भ्रष्ट ऑपरेटरों और सचिवों ने लूट का औजार बना लिया है। रविवार और राष्ट्रीय अवकाश, जब काम पूरी तरह प्रतिबंधित होता है, उस दिन हाजिरी दर्ज होना यह साबित करता है कि जिले में ‘अधिकारी-ठेकेदार-बिचौलिया’ का सिंडिकेट कितना मजबूत है।
जवाब कौन देगा?
करोड़ों रुपये का यह मनरेगा बजट उन गरीबों के लिए है जिनके पास दो वक्त की रोटी का साधन नहीं है। लेकिन बस्ती में यह पैसा ‘कागजी मजदूरों’ के जरिए सफेदपोशों की तिजोरियों में जा रहा है। क्या जिला प्रशासन इन ब्लॉकों के जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत दिखाएगा? या फिर जांच के नाम पर हमेशा की तरह फाइलें दबा दी जाएंगी?
“मनरेगा जैसी योजना, जो ग्रामीण भारत की रीढ़ है, उसे बस्ती के भ्रष्ट तंत्र ने अपनी जागीर समझ लिया है। 26 जनवरी को जहाँ पूरा देश राष्ट्र निर्माण का संकल्प ले रहा था, वहाँ कुदरहा और सदर जैसे ब्लॉकों में फर्जीवाड़े का संकल्प पूरा किया जा रहा था। ‘एक फोटो, तीन काम’ का खेल तकनीक की आँखों में धूल झोंकने जैसा है। अगर शासन ने अब भी इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ पर नकेल नहीं कसी, तो जनता का सिस्टम से भरोसा उठना तय है।”
बस्ती की जनता पूछ रही है—किसके संरक्षण में चल रहा है यह खुला डकैती कांड?















