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“मरीजों की जान से खिलवाड़: ओझा डायग्नोसिस सेंटर की ‘हस्ताक्षर विहीन’ रिपोर्टों का बड़ा खुलासा!”

"कागजों पर डॉक्टर, रिपोर्ट्स पर सन्नाटा: क्या केवल नाम के लिए रखे गए हैं विशेषज्ञ?"

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨स्वास्थ्य के नाम पर ‘हस्ताक्षर’ का खेल: ओझा डायग्नोसिस सेंटर के दावों की खुली पोल🚨

🔥बस्ती में स्वास्थ्य सेवा या धोखाधड़ी? 2022 से 2026 तक बिना साइन के बांटी गई मेडिकल रिपोर्ट्स।”

🔥”डॉक्टर के दावों की खुली पोल: ‘जल्दबाजी’ नहीं, यह तो 6 साल पुरानी ‘जालसाजी’ है!”

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जिले के स्वास्थ्य विभाग में उस वक्त हड़कंप मच गया जब शहर के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले ओझा डायग्नोसिस सेंटर की एक बड़ी लापरवाही उजागर हुई। मामला केवल एक चूक का नहीं, बल्कि सैकड़ों मरीजों की जिंदगी के साथ किए जा रहे उस खिलवाड़ का है, जहाँ वर्षों से बिना डॉक्टर के हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट धड़ल्ले से बांटी जा रही हैं।

⭐दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में डॉ. सतेंद्र मणि ओझा यह तर्क देते नजर आए कि “मरीज जल्दी में रिपोर्ट ले गए, इसलिए हस्ताक्षर नहीं हो पाए।” लेकिन जब पिछले 6 वर्षों की रिपोर्टों को खंगाला गया, तो सच्चाई कुछ और ही निकली। 2022 से लेकर 2026 तक की अनगिनत रिपोर्टों पर डॉक्टरों के हस्ताक्षर न होना यह साबित करता है कि यह कोई ‘जल्दबाजी’ नहीं, बल्कि संस्थान की सोची-समझी कार्यप्रणाली का हिस्सा है।

⭐कागजों पर डॉक्टर, मैदान में ‘सन्नाटा’

जांच के घेरे में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। सेंटर पर डॉ. कपिस मित्तल और डॉ. प्रमोद दीक्षित के नाम तो दर्ज हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये नाम केवल औपचारिक हैं। रिपोर्ट्स पर उनके हस्ताक्षर न होना इस संदेह को पुख्ता करता है कि क्या ये डॉक्टर वास्तव में वहां सेवाएं दे रहे हैं या उनके नाम का इस्तेमाल केवल लाइसेंस बचाने के लिए किया जा रहा है?

⭐कानून की नजर में गंभीर अपराध

मेडिकल रिपोर्ट्स पर अधिकृत डॉक्टर के हस्ताक्षर का न होना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कानून का सीधा उल्लंघन है:

📢Clinical Establishments Act, 2010: इसके तहत हर रिपोर्ट का सत्यापित होना अनिवार्य है।

📢IPC की धारा 420 व 468: बिना सत्यापन के रिपोर्ट जारी करना जालसाजी और धोखाधड़ी के दायरे में आता है।

📢NMC Act, 2019: गलत या अप्रमाणित दस्तावेज जारी करना डॉक्टर की पेशेवर नैतिकता के विरुद्ध है।

⭐स्वास्थ्य विभाग ने कसा शिकंजा

इस सनसनीखेज खुलासे के बाद पीसीपीएनडीटी नोडल अधिकारी डॉ. ए.के. चौधरी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर को नोटिस थमा दिया है। विभाग ने तीन दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर वर्षों से बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट क्यों जारी की जा रही थीं।

😇बड़ा सवाल: क्या चंद रुपयों के मुनाफे के लिए मरीजों की जांच रिपोर्ट के साथ ऐसा समझौता जायज है? अगर रिपोर्ट गलत हुई और उस पर किसी जिम्मेदार डॉक्टर के हस्ताक्षर ही नहीं हैं, तो मरीज न्याय के लिए कहां जाएगा?

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