
अजीत मिश्रा (खोजी)
🔔स्वास्थ्य के ‘कसाईखानों’ पर कब तक मेहरबान रहेगा प्रशासन?🔔
👉जांच का ‘झुनझुना’ और न्याय का ‘जनाजा’: स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत बेनकाब।
10 अप्रैल 2026, ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती, उत्तर प्रदेश
बस्ती। कहने को तो डॉक्टर धरती का भगवान होता है, लेकिन बस्ती जनपद में निजी अस्पतालों के रूप में खुले ‘मौत के अड्डों’ ने इस परिभाषा को बदल कर रख दिया है। यहाँ सफेद कोट पहनकर बैठा ‘यमराज’ मरीजों की नब्ज नहीं, बल्कि उनकी जेब और अंततः उनकी सांसें टटोल रहा है। कटरा, पचपेड़िया और कैली रोड के इन अस्पतालों में इलाज के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह अब चिकित्सा नहीं, बल्कि संगठित अपराध की श्रेणी में आता है।
✍️जांच का ढोंग और फाइलों में दफन इंसाफ
हैरानी की बात यह है कि जब किसी मरीज की मौत पर हंगामा होता है, तो प्रशासन ‘जांच’ का एक झुनझुना थमा देता है। कुछ दिनों के लिए अस्पताल का एक कमरा सील कर दिया जाता है, मानों सारी लापरवाही उसी एक कमरे में बंद थी। लेकिन जैसे ही मामला मीडिया की सुर्खियों से उतरता है, ‘रिपोर्ट का खेल’ शुरू हो जाता है। साक्ष्यों को मिटाया जाता है, गवाहों को डराया जाता है और अंततः फाइल पर धूल की परत जमाकर उसे बंद कर दिया जाता है।
✍️विभाग की ‘मौन’ सहमति या मजबूरी?
जिले में करीब 120 निजी अस्पताल कागजों पर हैं, लेकिन हकीकत में इनकी संख्या दोगुनी से ज्यादा है। बिना मानकों के चल रहे ये अस्पताल क्या स्वास्थ्य विभाग की नजरों से ओझल हैं? बिल्कुल नहीं। यह विभागीय अधिकारियों की वह ‘ऊंची पैठ’ और ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ सेटिंग है, जिसके कारण आज तक किसी भी रसूखदार अस्पताल पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई। क्या नोडल अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग केवल रस्म अदायगी के लिए हैं?
✍️चार केस, एक ही कहानी: सिस्टम की नाकामी
- केस 1: कैली रोड पर एक बुजुर्ग की मौत, जांच हुई, लेकिन रिपोर्ट में खेल कर अस्पताल को बचा लिया गया।
- केस 2: जिगिना रोड पर गलत उपचार से जान गई, शिकायत हुई, पर पीड़ित आज भी न्याय के लिए भटक रहा है।
- केस 3: रोडवेज स्थित अस्पताल में नवजात की मौत, फिर वही सीलिंग का नाटक और फिर वही लीपापोती।
- केस 4: 6 अप्रैल को कटरा में एक और बुजुर्ग की मौत, लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी हाथ लगी तो सिर्फ लाश।
जनता कब तक सहेगी यह सितम?
ये आंकड़े सिर्फ मौत के नहीं हैं, ये उस विश्वास की हत्या के हैं जो एक आम आदमी सरकारी व्यवस्था और डॉक्टरों पर करता है। राजनीतिक दबाव और ‘मरीज माफिया’ का यह गठजोड़ बस्ती की जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है।
🔥बस्ती के निजी अस्पताल: इलाज के नाम पर ‘सफेदपोश कसाईखाने’!
🔥मौत का सौदागर बना सिस्टम: जांच के नाम पर फाइलों में दफन हो रही हैं सिसकियां।
🔥स्वास्थ्य विभाग की ‘सेटिंग’ या मरीजों की ‘वेटिंग’? आखिर कब रुकेगा मौतों का तांडव?
🔥कागजों पर सील, हकीकत में ढील: क्या रसूखदारों के आगे नतमस्तक है प्रशासन?
चेतावनी: अगर प्रशासन अब भी गहरी नींद से नहीं जागा और इन ‘मानक विहीन’ कसाईखानों पर बुलडोजर नहीं चला, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्ती की सड़कों पर जनता का आक्रोश फूटेगा। अब जांच नहीं, सीधा प्रहार चाहिए। उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो अपनी जेब भरने के लिए गरीबों की लाशों का सौदा कर रहे हैं।



















