
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार की ‘पोलियो ड्राप’: गौर CHC में 200 कर्मियों का हक डकार गए साहब!
- साहब की ‘काली कमाई’ और वालंटियरों की रुलाई; भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा पोलियो अभियान
- हक मांगने पर कर्मचारियों को मिला नोटिस, सीएमओ की चुप्पी ने खड़े किए गंभीर सवाल।
- नियमों को ‘पोलियो’ मार गया! अधीक्षक भास्कर यादव की मनमानी के आगे नतमस्तक स्वास्थ्य विभाग
- खुद ड्यूटी से नदारद रहने वाले साहब ने मेहनत कश कर्मचारियों को थमाई अनुशासन की नसीहत।
- बस्ती: गौर CHC में बड़ा वित्तीय फर्जीवाड़ा, कर्मियों के खून-पसीने की कमाई का बंदरबांट!
- क्या दोषियों पर गिरेगी गाज या सीएमओ की सरपरस्ती में दबेगा घोटाला?
- सत्ता और रसूख का नंगा नाच: पल्स पोलियो के पैसों में ‘करोड़पति’ बनने का खेल उजागर!
- एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने खोला मोर्चा, अधीक्षक की पोल-पट्टी हुई साफ।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश दिनांक: 10 अप्रैल, 2026
बस्ती। जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) गौर से भ्रष्टाचार की एक ऐसी दुर्गंध आ रही है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के शुचिता के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 के पल्स पोलियो अभियान में मेहनत करने वाले आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, एएनएम और वालंटियरों के पसीने की कमाई पर ‘साहबों’ ने डाका डाल दिया है। सरकारी धन के बंदरबांट का यह खेल इतना शातिराना है कि करीब 200 कर्मचारियों का मानदेय महज 23 चुनिंदा खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।
साहब की जुगलबंदी, कर्मचारियों की बर्बादी
सूत्रों की मानें तो इस पूरे ‘वित्तीय खेल’ के मास्टरमाइंड सीएचसी अधीक्षक भास्कर यादव और आईओ (IO) राकेश कुमार बताए जा रहे हैं। इन दोनों की कथित मिलीभगत से कागजों पर वह जादूगरी की गई कि सैकड़ों कर्मियों का पैसा चंद रसूखदारों की जेबों में पहुंच गया। अब हालत यह है कि तपती धूप में घर-घर जाकर बच्चों को दवा पिलाने वाले वालंटियर अपने ही हक के पैसे के लिए सीएचसी के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें इंसाफ के बजाय अपमान मिल रहा है।
हक मांगा तो मिली ‘नोटिस’ की घुड़की
जब पीड़ित कर्मचारियों ने एकजुट होकर शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज कराया और ज्ञापन सौंपना चाहा, तो अधीक्षक भास्कर यादव का ‘तानाशाही’ रवैया सामने आ गया। कर्मचारियों की समस्या सुनने के बजाय, साहब ने उन्हें नसीहतें दे डालीं और कार्रवाई की धमकी देते हुए नोटिस थमा दिया।
बड़ा सवाल: जो अधीक्षक खुद न समय से ड्यूटी करते हैं और न ही मुख्यालय पर रात्रि निवास के नियमों का पालन करते हैं, वे अपने मातहतों को अनुशासन का पाठ किस हैसियत से पढ़ा रहे हैं?
सीएमओ साहब की ‘चुप्पी’ पर उठते सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली भूमिका मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की है। अधीक्षक भास्कर यादव के कारनामों की पोल-पट्टी लगातार खुल रही है, लेकिन सीएमओ साहब ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। कार्रवाई के बजाय अधीक्षक को मिली ‘खुली छूट’ विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करती है। क्या जिले के आला अधिकारी भी इस बंदरबांट के मूक गवाह बने रहेंगे?
सिस्टम से जवाब मांगता आम आदमी
पल्स पोलियो जैसे संवेदनशील अभियान के पैसे में इतनी बड़ी हेराफेरी शासन की मंशा पर भी सवालिया निशान लगाती है।
- क्या उन 200 वालंटियरों के मेहनत की कमाई उन्हें वापस मिलेगी?
- क्या भ्रष्टाचार के आरोपियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा?
- या फिर ‘साहब’ की मनमानी और रसूख के आगे गरीब कर्मचारियों की आवाज दबा दी जाएगी?
अब देखना यह है कि इस गंभीर वित्तीय अनियमितता पर शासन स्तर से जांच बैठती है या फिर गौर सीएचसी भ्रष्टाचार का नया ‘मॉडल’ बनकर उभरेगा।



















