डिजिटल सुधार के दावों के बीच फंसी व्यवस्था: पटवारियों के बहिष्कार से जनता हलकान, प्रशासन और सरकार पर उठते सवाल

सागर।वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी 8225072664 * मध्य प्रदेश में प्रशासनिक प्रक्रियाओं को ऑनलाइन और सुगम बनाने के दावों की जमीनी हकीकत खुलकर सामने आ गई है। जिले के पटवारियों ने खसरा-खतौनी के डेटा में भारी विसंगतियों (डेटा अशुद्धिकरण) का हवाला देते हुए नामांतरण और रजिस्ट्री से संबंधित जांच व प्रमाणीकरण कार्यों से हाथ खींच लिए हैं।
पटवारियों का दो टूक कहना है कि जब तक पोर्टल और रिकॉर्ड्स में दर्ज गड़बड़ियों को सुधारा नहीं जाता, वे अधूरी और गलत जानकारियों के आधार पर काम नहीं करेंगे। इस टकराव ने सीधे तौर पर मोहन यादव सरकार की कार्यप्रणाली और सागर जिले के स्थानीय नेतृत्व की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार लगातार 'डिजिटल गवर्नेंस' और पारदर्शी प्रशासन का प्रचार कर रही है, लेकिन सागर का वर्तमान गतिरोध यह दिखाता है कि नीति निर्माण और मैदानी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है।
विभिन्न विभागीय पोर्टलों के एकीकरण और रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन के नाम पर जमीनी स्तर पर डेटा की जो मैपिंग की गई, उसमें भारी गलतियां रह गईं। रकबे में विसंगतियां, नाम में अंतर और संयुक्त खातों की त्रुटियां आज भी जस की तस हैं।
प्रशासनिक स्तर पर बिना त्रुटि निवारण तंत्र दिए नीचे के कर्मचारियों पर काम थोपा जा रहा है। पटवारियों की आशंका स्वाभाविक है कि यदि गलत डेटा पर काम आगे बढ़ाया गया, तो भविष्य में होने वाले विवादों और कानूनी कार्रवाइयों की गाज केवल उन्हीं पर गिरेगी।
इस प्रशासनिक गतिरोध का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। किसानों को जमीन के नामांतरण, फौती और ऋण लेने के लिए भटकना पड़ रहा है, वहीं प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त रुकने से रजिस्ट्री कार्यालयों में सन्नाटा है।
सरकार के पास इस गतिरोध को तुरंत सुलझाने की कोई ठोस कार्ययोजना नजर नहीं आ रही। जिला प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत रसूख रखता है और यहां से कैबिनेट स्तर का प्रतिनिधित्व शासन में है। बावजूद इसके, जिले के सबसे बुनियादी राजस्व मुद्दे पर स्थानीय मंत्री और जनप्रतिनिधियों का रुख उदासीन बना हुआ है।
जिले में रजिस्ट्री का काम ठप होने की कगार पर है और राजस्व व्यवस्था पूरी तरह चरमरा रही है, तब स्थानीय मंत्री को आगे आकर प्रशासन और कर्मचारियों के बीच समन्वय स्थापित करना चाहिए था। लेकिन अब तक किसी भी ठोस हस्तक्षेप का अभाव यह दर्शाता है कि स्थानीय जनसमस्याएं प्राथमिकताओं में नहीं हैं।
जमीनों की रजिस्ट्री रुकने से न केवल आम नागरिक मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान हैं, बल्कि राज्य सरकार के खजाने को मिलने वाले स्टांप शुल्क और पंजीयन राजस्व का भी भारी नुकसान हो रहा है। स्थानीय नेतृत्व की इस मामले में निष्क्रियता जनता के बीच नाराजगी की वजह बन रही है।
पटवारियों का यह कदम केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि राज्य के राजस्व ढांचे की उस खामी का दस्तावेज है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जा रहा है। तकनीक का उद्देश्य काम को आसान बनाना होना चाहिए, न कि ऐसी उलझन पैदा करना जिससे पूरा तंत्र ही जाम हो जाए।
यदि मोहन सरकार और जिले का प्रशासनिक व राजनीतिक नेतृत्व समय रहते डेटा शुद्धिकरण के लिए तकनीकी संसाधन और व्यावहारिक समय-सीमा तय नहीं करता, तो यह संकट आने वाले दिनों में और विकराल रूप ले सकता है। सरकार को चाहिए कि वह दबाव की राजनीति छोड़कर त्रुटिहीन डेटा प्रणाली तैयार करे, ताकि कर्मचारी निडर होकर काम कर सकें और जनता को अपने ही हक के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
🔔 Vande Bharat News Alerts
नई प्रमुख खबरों की browser notification पाने के लिए Subscribe करें।






